UP News: उत्तर प्रदेश की पहचान सिर्फ काशी, अयोध्या, आगरा और मुरादाबाद जैसे शहरों से नहीं होती. यहां कुछ शहर ऐसे भी हैं, जिनकी पहचान किसी ऐतिहासिक इमारत या धार्मिक स्थल से नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही हुनरमंद कारीगरी से बनी है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश का मेरठ ऐसा ही शहर है. इसे यूं ही ‘कैंचियों का शहर’ नहीं कहा जाता. यहां कैंची सिर्फ काटने का औजार नहीं, बल्कि करीब साढ़े तीन सदियों से चली आ रही एक जीवंत विरासत है. मेरठ की कैंची की मजबूती और लंबे इस्तेमाल को लेकर स्थानीय कहावत मशहूर है—‘दादा ले, पोता बरपे’. यानी दादा के खरीदे सामान को पोता भी इस्तेमाल कर सके. यही कहावत इस कारीगरी की टिकाऊ पहचान को बयां करती है.
1650 के आसपास शुरू हुई कहानी, आज भी चल रही वही धार
मेरठ में कैंची बनाने की शुरुआत को लेकर अलग-अलग प्रकाशित स्रोतों में साल में थोड़ा अंतर मिलता है. स्थानीय परंपरा इसे 17वीं सदी के मध्य से जोड़ती है. एक प्रचलित कहानी के अनुसार अखुनजी नाम के लोहार ने दो तलवारों को जोड़कर चमड़ा काटने के लिए कैंची तैयार की थी. बाद में यही काम परिवारों और कारीगरों के बीच पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता गया. सरकारी औद्योगिक प्रोफाइल और GI से जुड़े दस्तावेज मेरठ के कैंची क्लस्टर को करीब 300 से अधिक साल पुरानी परंपरा बताते हैं. यानी तारीख को लेकर भले अलग-अलग दावे हों, लेकिन एक बात पर लगभग सभी स्रोत सहमत हैं—मेरठ की कैंची बनाने की परंपरा कई सदियों पुरानी है.
मशीन नहीं, हाथों की कारीगरी है मेरठ की असली ताकत
मेरठ की कैंची की खासियत सिर्फ उसके लोहे में नहीं, बल्कि उसे बनाने वाले हाथों में है. यहां कैंची तैयार करने की प्रक्रिया में कारीगर धातु को गर्म करने से लेकर उसकी धार, जोड़, आकार और अंतिम पॉलिश तक कई चरणों से गुजारते हैं. मेरठ में अलग-अलग जरूरत के हिसाब से टेलरिंग, बार्बर, पेपर, जनरल और डिजाइनिंग सहित कई तरह की कैंचियां बनाई जाती हैं. GI से जुड़े दस्तावेजों में मेरठ के कैंची क्लस्टर में विभिन्न प्रकार की कैंचियों के निर्माण का उल्लेख मिलता है. हैरत की बात यह है कि अनुभवी कारीगर कैंची की धार और दोनों ब्लेड के संतुलन का अंदाजा अपने हाथों से लगा लेते हैं. यही हुनर मशीन से बनी सामान्य कैंचियों से मेरठ की हस्तनिर्मित कैंची को अलग पहचान देता है.
कबाड़ के लोहे से बनती है ‘उम्रदराज’ कैंची
मेरठ की कैंची की एक और खासियत इसका रीसाइकिलिंग से जुड़ा मॉडल है. कई कैंचियों में इस्तेमाल होने वाला स्टील और अन्य धातु पुरानी धातु या स्क्रैप से लिया जाता है. यही पुरानी धातु कारीगरों के हाथों से गुजरकर नया रूप लेती है. यानी जिस कबाड़ को आम नजर बेकार समझती है, वही मेरठ के कारीगरों के हाथ में जाकर ऐसी कैंची बन जाता है, जो वर्षों तक चलने का दावा रखती है.
कैंची बाजार से निकली धार, देश से विदेश तक पहुंची
मेरठ का कैंची बाजार इस उद्योग का प्रमुख केंद्र रहा है. यहां छोटे-छोटे प्रतिष्ठानों और कार्यशालाओं में परिवारों के लोग मिलकर कैंची तैयार करते रहे हैं. पुराने सरकारी और औद्योगिक दस्तावेजों में मेरठ के कैंची क्लस्टर में सैकड़ों इकाइयों और हजारों लोगों के रोजगार से जुड़े होने का उल्लेख मिलता है. MSME की औद्योगिक प्रोफाइल में एक क्लस्टर के लिए 225 कार्यशील इकाइयां, करीब 50 हजार रोजगार और लगभग 25 करोड़ रुपये का टर्नओवर दर्ज है. अलग-अलग वर्षों और परिभाषाओं के कारण उद्योग के आकार के आंकड़ों में अंतर मिलता है. एक समय मेरठ की कैंची बर्मा और सिंगापुर तक भेजे जाने का उल्लेख GI दस्तावेजों में मिलता है. बाद के वर्षों में इसके निर्यात का दायरा और बढ़ा. अमर उजाला की एक रिपोर्ट में केन्या, कजाकिस्तान, घाना और रूस सहित 50 से अधिक देशों तक मेरठ की कैंची पहुंचने की बात कही गई थी.
2013 में मिली पहचान, कैंची को मिला GI टैग
मेरठ की इस सदियों पुरानी कारीगरी को बड़ी पहचान तब मिली, जब मेरठ कैंची को 2013 में भौगोलिक संकेत यानी GI टैग मिला. GI टैग ने इस उत्पाद को सिर्फ स्थानीय बाजार की वस्तु नहीं रहने दिया, बल्कि उसकी भौगोलिक पहचान को औपचारिक मान्यता दी. GI दस्तावेजों में मेरठ कैंची को विशिष्ट भौगोलिक उत्पाद के रूप में दर्ज किया गया है.
महंगाई ने भी बढ़ाई मुश्किल, कैंची हुई 20 फीसदी तक महंगी
मई 2026 की मेरठ की रिपोर्ट बताती है कि पिछले छह महीनों में महंगाई और GST के असर से कैंची की कीमतों में करीब 20 फीसदी तक वृद्धि हुई. रिपोर्ट के अनुसार मेरठ में घरेलू इस्तेमाल से लेकर प्रोफेशनल टेलर और ब्यूटी सेक्टर तक की कैंचियां बनती हैं और आकार के हिसाब से छह से 18 इंच तक की कैंची तैयार होती है. यानी सदियों पुराना उद्योग आज भी जिंदा है, लेकिन उसके सामने लागत, बाजार और सस्ते आयात की चुनौतियां बनी हुई हैं.
फिर भी कारीगरों की उम्मीद नहीं टूटी
मुश्किलों के बावजूद मेरठ के कारीगरों ने अपनी धार नहीं छोड़ी. 2026 में स्थानीय कारोबारियों के बीच स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देने की अपील से भी नई उम्मीद जगी. केंद्र सरकार ने भी मेरठ की कैंची को छोटे और कुटीर उद्योगों की महत्वपूर्ण पहचान बताते हुए वैश्विक बाजार तक पहुंच बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया है.
एक कैंची में छिपी है मेरठ की पूरी कहानी
मेरठ की कैंची को सिर्फ लोहे के दो धारदार टुकड़ों को जोड़कर बनाया गया सामान समझना भूल होगी. इसके पीछे सदियों का हुनर, परिवारों की पीढ़ियां, छोटी कार्यशालाएं, कारीगरों की मेहनत और बदलते बाजार से लड़ने की कहानी है. कभी अखुनजी से शुरू हुई बताई जाने वाली यह परंपरा आज GI टैग तक पहुंच चुकी है. कभी स्थानीय बाजार में बिकने वाली कैंची विदेशों तक पहुंची. चीन की सस्ती कैंची से मुकाबला हुआ, GST और महंगाई ने दबाव बढ़ाया, लेकिन मेरठ की कैंची की धार अब भी कायम है. यही वजह है कि मेरठ को ‘कैंची शहर’ कहना महज एक उपनाम नहीं—यह उस शहर के उन हजारों हाथों को सलाम है, जिन्होंने पीढ़ियों से लोहे को धार और अपने हुनर को पहचान दी है.
एक नजर में मेरठ की कैंची
- परंपरा: करीब 300-350+ वर्षों से चली आ रही कारीगरी
- GI टैग: 2013 में मेरठ कैंची को GI पहचान मिली
- प्रमुख उत्पाद: टेलर, बार्बर, पेपर, जनरल और अन्य विशेष कैंचियां
- खासियत: हाथों की कारीगरी, मजबूती और टिकाऊपन
- प्रमुख बाजार: देशभर के अलावा विभिन्न विदेशी बाजार
- बड़ी चुनौती: सस्ती चीनी कैंची, लागत, GST और महंगाई
- पहचान: ‘कैंचियों का शहर’—मेरठ
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