Krishna Janmashtami 2026: जन्माष्टमी पर याद आए रसखान के कान्हा: “ताहि अहीर की छौरियाँ, छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं”, विराट कृष्ण का गोकुल में ऐसा रूप

जन्माष्टमी का पर्व कवि रसखान की कृष्ण भक्ति को जीवंत कर देता है. उनकी रचनाएं उस कृष्ण को दर्शाती हैं जो विराट होते हुए भी गोकुल की गलियों में गोपियों के साथ सहजता से विचरण करते हैं.

Krishna Janmashtami 2026: देश-दुनिया में आज कृष्ण जन्मोत्सव की भारी धूम है. मथुरा, वृंदावन और गोकुल की गलियां नंदलाल के जयकारों से गूंज रही हैं . जन्माष्टमी के अवसर पर जब ब्रज में नंदलाल के जन्म की खुशियां मनाई जाती हैं, तब भक्तों को कवि रसखान की कृष्ण-भक्ति से जुड़ी रचनाएं भी याद आती हैं. रसखान ने अपने काव्य में श्रीकृष्ण के उस स्वरूप को उकेरा, जो एक ओर पूरे ब्रह्मांड के विराट स्वरूप के स्वामी हैं और दूसरी ओर गोकुल की गलियों में ग्वाल-बालों और अहीर की छोरियों के बीच सहज भाव से दिखाई देते हैं. यही विरोधाभास उनकी कृष्ण-भक्ति को बेहद खास और जिवंत बनाता है.

जिसका पार सुर-नर-मुनि भी न पाएं, वही गोकुल में नाचता है

रसखान की प्रसिद्ध पंक्तियों में कृष्ण की इसी लीला का मनोहारी चित्र मिलता है— “रूप विराट जगत सम्राट हैं, सुर नर मुनि जाको पार न पावैं, ताहि अहीर की छौरियाँ, छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं.” इन पंक्तियों का भाव है कि जिस श्रीकृष्ण की महिमा का पार देवता, मनुष्य और मुनि तक नहीं पा सकते, वही गोकुल में अहीर की छोरियों के प्रेम और अपनत्व में बंधकर नाचते दिखाई देते हैं. जन्माष्टमी पर यह भाव कृष्ण के बाल और लोकजीवन से जुड़े रूप को सामने लाता है.

रसखान के लिए कृष्ण का गोकुल वैभव से भी बड़ा

कवि रसखान ने कृष्ण के प्रति अपने प्रेम को राजसी वैभव से ऊपर रखा. उनकी प्रसिद्ध पंक्तियां हैं— “या लकुटी अरु कामरिया पर, राज तिहूँ पुर को तजि डारौं, आठहुँ सिद्धि नवौ निधि को सुख, नंद की धैनु चराइ बिसारौं.” अर्थात कृष्ण की लकुटी और कामरिया के सामने तीनों लोकों का राज भी त्यागने योग्य है. नंद की गायें चराने में जो आनंद है, वह आठों सिद्धियों और नौ निधियों के सुख से भी बड़ा है.

जन्माष्टमी पर जीवंत हो उठता है रसखान का ब्रज

कृष्ण जन्माष्टमी पर मथुरा, वृंदावन, गोकुल, बरसाना और गोवर्धन में जब भक्ति का वातावरण बनता है, तब रसखान की रचनाओं का भाव भी सहज रूप से याद आता है. उनकी कविता में कृष्ण केवल दिव्य शक्ति नहीं, बल्कि ब्रज के अपने कान्हा हैं. वे कभी मुरली बजाते हैं, कभी गाय चराते हैं और कभी ग्वालिनों के बीच बाल सुलभ चंचलता दिखाते हैं. यही लोकजीवन से जुड़ा कृष्ण जन्माष्टमी की आस्था को और आत्मीय बना देता है.

कृष्ण के प्रेम में डूबे थे कवि रसखान

रसखान हिंदी साहित्य के भक्तिकाल के प्रमुख कृष्णभक्त कवियों में गिने जाते हैं. वे दिल्ली के एक समृद्ध पठान परिवार में जन्मे थे.उनका वास्तविक नाम सैयद इब्राहिम था .जब वे भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में पूरी तरह लीन हो गए, तब वे ब्रज (वृंदावन) आ गए. यहाँ आकर उन्होंने गोस्वामी विट्ठलनाथ जी से दीक्षा ली और इनका नाम 'रसखान' पड़ा, जिसका अर्थ है—‘रस की खान’ .उन्होंने ब्रजभाषा में कृष्ण की बाल लीलाओं, गोकुल, यमुना और ब्रजभूमि के प्रति अपना गहरा अनुराग व्यक्त किया. उनकी रचनाओं में कृष्ण के प्रति ऐसा प्रेम दिखाई देता है, जिसमें भगवान और भक्त के बीच दूरी कम होकर आत्मीय संबंध का रूप ले लेती है. जन्माष्टमी के अवसर पर रसखान का काव्य इसी प्रेम और भक्ति की परंपरा को फिर से जीवंत करता है. Also Read: Janmashtami Traffic: आज मथुरा-वृंदावन जाने से पहले जान लें पार्किंग और नो-एंट्री रूट, वरना कट जाएगा चालान, देखें पूरी लिस्ट...

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By अंजली कश्यप

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