काशी का वो अनोखा विद्रोह: पान में छिपे संदेश, मिठाई में तिरंगा और महफिलों में गूंजा आजादी का तराना

UP News: काशी के स्वतंत्रता आंदोलन की कहानी सिर्फ नेताओं तक सीमित नहीं थी. यहां के हलवाई, पान विक्रेता और कलाकारों ने अपनी कला और रोजमर्रा की चीजों से अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज उठाई. बनारसी पान में छिपे संदेशों से लेकर तिरंगी बर्फी तक, जानें ये अनूठी विरासत.

Indian Independence Story: बनारस में स्वतंत्रता आंदोलन की कहानी सिर्फ आंदोलनों, सभाओं और क्रांतिकारियों तक सीमित नहीं रही. यहां आम लोगों ने अपनी रोजमर्रा की चीजों और कला को भी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज बनाने का तरीका खोज लिया था. बनारसी पान से संदेश पहुंचाने, मिठाइयों के जरिए तिरंगे का प्रतीक बनाने और संगीत की महफिलों में देशभक्ति के गीत गाने जैसी परंपराएं इसी दौर से जुड़ी बताई जाती हैं. काशी के हलवाई, पान विक्रेता और कलाकार अपने-अपने अंदाज में आंदोलनकारियों का हौसला बढ़ाते थे.

दालमंडी की महफिलों में होती थी आंदोलन की चर्चा

आजादी के आंदोलन के दौर में दालमंडी की गलियों में सजने वाली संगीत की महफिलें सिर्फ मनोरंजन का केंद्र नहीं थीं. इतिहास से जुड़े विवरणों के मुताबिक, राजेश्वरी बाई, जद्दन बाई, रसूलन बाई और अन्य कलाकारों की महफिलों में देशभक्ति की भावना दिखाई देती थी. कुछ जानकारों के अनुसार, इन जगहों पर अंग्रेजी शासन के खिलाफ चर्चाएं भी होती थीं. संगीत और ठुमरी के जरिए लोगों में राष्ट्रीय चेतना जगाने की कोशिश की जाती थी और कलाकार अपने प्रदर्शन से आंदोलनकारियों का मनोबल बढ़ाती थीं.

गीतों से अंग्रेजी हुकूमत को दिया जवाब

काशी की कई मशहूर गायिकाओं ने अपनी कला को देशभक्ति से जोड़ दिया था. राजेश्वरी बाई के बारे में बताया जाता है कि वह अपनी महफिलों में देशभक्ति से जुड़ी बंदिशें जरूर प्रस्तुत करती थीं. रसूलन बाई ने भी आजादी के प्रति अपनी प्रतिबद्धता अलग तरीके से जाहिर की. वहीं सिद्धेश्वरी देवी जैसी प्रसिद्ध कलाकारों की महफिलों में भी राष्ट्रवादी गीतों की मौजूदगी का उल्लेख मिलता है. इस तरह संगीत उस समय लोगों के भीतर देशप्रेम और स्वतंत्रता की भावना जगाने का माध्यम बना.

पान के पत्ते में छिपकर पहुंचती थी खबर

बनारसी पान को लेकर स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी एक दिलचस्प कहानी भी सामने आती है. चौक इलाके में पान की दुकान चलाने वाले राम नारायण चौरसिया के बारे में बताया जाता है कि वह पान के जरिए क्रांतिकारियों तक पुलिस की गतिविधियों की जानकारी पहुंचाते थे. पान के पत्ते के नीचे संदेश लिखे जाने की बात कही जाती है. उस दौर में चौक थाना महत्वपूर्ण माना जाता था. ऐसे में पुलिस की हलचल से जुड़ी जानकारी आंदोलनकारियों के लिए उपयोगी होती थी.

तिरंगे पर रोक लगी तो बनी तिरंगी बर्फी

अंग्रेजी शासन के दौर में तिरंगे के सार्वजनिक प्रदर्शन पर कई जगह पाबंदियां थीं. काशी के हलवाइयों ने इसका जवाब मिठाई के जरिए देने का तरीका खोजा. ठठेरी बाजार के मदन गोपाल गुप्ता और कचौड़ी गली के बचानू साव जैसे हलवाइयों से जुड़ी परंपरा में तिरंगी बर्फी तैयार किए जाने का उल्लेख मिलता है. बादाम, पिस्ता और केसर से बनाई गई इस मिठाई में तिरंगे के तीन रंगों को उकेरा जाता था. इससे देशभक्ति का संदेश लोगों तक पहुंचता था.

जवाहर लड्डू और गांधी गौरव भी बने पहचान

तिरंगी बर्फी के साथ काशी के हलवाई समाज ने कई अन्य मिठाइयों को भी राष्ट्रवादी नाम दिए. जवाहर लड्डू, गांधी गौरव और वल्लभ संदेश जैसी मिठाइयां इसी परंपरा से जुड़ी बताई जाती हैं. इन मिठाइयों के नाम उस दौर के प्रमुख राष्ट्रीय नेताओं और स्वतंत्रता आंदोलन की भावना को दर्शाते थे. तिरंगे के सार्वजनिक प्रदर्शन पर रोक के बीच मिठाइयों के जरिए राष्ट्रीय भावना व्यक्त करना काशी के लोगों की रचनात्मक सोच को दिखाता है. यह परंपरा बाद के वर्षों में भी लोगों के बीच बनी रही.

आज भी जिंदा है काशी की यह विरासत

आज तिरंगी बर्फी और बनारसी पान काशी की पहचान का हिस्सा हैं और राष्ट्रीय पर्वों पर इनकी चर्चा और मांग बढ़ जाती है. तिरंगी बर्फी को जीआई टैग मिलने के बाद इसकी पहचान और मजबूत हुई, जबकि बनारसी पान को भी अप्रैल 2023 में जीआई टैग मिला. आज ये दोनों चीजें सिर्फ खान-पान की पहचान नहीं हैं. इनके साथ स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी कई कहानियां भी जुड़ी हैं, जो बताती हैं कि काशी ने संस्कृति, स्वाद और कला के जरिए भी राष्ट्रप्रेम को जीवित रखा.

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By नटवर कुमार

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