Agra Sweet Potato Farming: आगरा में आलू की खेती के साथ अब शकरकंद की खेती को भी बढ़ावा देने की तैयारी शुरू हो गई है. अंतरराष्ट्रीय आलू अनुसंधान केंद्र (CIP) के सींगना में बन रहे दक्षिण एशिया क्षेत्रीय केंद्र (C-SARC) में वैज्ञानिकों ने शकरकंद की अलग-अलग किस्मों पर शोध शुरू कर दिया है. वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि यहां की मिट्टी और वातावरण में इन किस्मों के सफल होने से प्रदेश के किसानों को शकरकंद की खेती का बेहतर विकल्प मिल सकेगा.
भारत समेत कई देशों की किस्मों पर शोध
सींगना में बन रहे अनुसंधान केंद्र और वहां चल रहे शोध को लेकर मंगलवार को शाहजहां गार्डन स्थित सी-सार्क कार्यालय में सीआईपी के पदाधिकारियों की बैठक हुई. इसमें सीआईपी महानिदेशक सिमोन हेक, सीआईपी-चाइना सेंटर फॉर एशिया पैसिफिक निदेशक यानमिन शी, अफ्रीका सीआईपी क्षेत्रीय निदेशक जॉयस, लैटिन अमेरिका सीआईपी क्षेत्रीय निदेशक वियन पोलर और सी-सार्क निदेशक डॉ. सुधांशु सिंह शामिल हुए.
वियतनाम, अफ्रीका और चीन की किस्मों पर भी चर्चा
बैठक में आलू के साथ शकरकंद की भारत की किस्मों के अलावा वियतनाम, अफ्रीका, चीन और बांग्लादेश की अच्छी किस्मों को यहां के वातावरण में विकसित करने और किसानों के लिए उपयोगी बनाने की योजनाओं पर चर्चा हुई. इससे पहले अधिकारियों ने सींगना स्थित निर्माणाधीन अनुसंधान केंद्र और वहां लगाई गई शकरकंद की किस्मों का निरीक्षण भी किया.
बैंगनी, नारंगी और सफेद गूदे वाली किस्मों का ट्रायल
सी-सार्क निदेशक डॉ. सुधांशु सिंह ने बताया कि सींगना में खरीफ की नौ शकरकंद की किस्मों का ट्रायल लगाया गया है. इनमें बैंगनी, नारंगी और सफेद गूदे वाली किस्में शामिल हैं. इसके अलावा एक किस्म ऐसी भी है, जिसका गूदा सफेद और छिलका लाल है. अधिकतर किस्मों का आकार अंडाकार है और ये सभी विटामिन से भरपूर हैं.
ट्रायल में ये नौ किस्में शामिल
ट्रायल में भू-अरुणिमा, भू-कृष्ण, भू-सोना, कमला सुंदरी, एसपी 94/4, कंचनगढ़, कृष्णा, कोरापुट लैंडरेस (लाल छिलका) और कोरापुट लैंडरेस (सफेद छिलका) शामिल हैं.
सफल प्रयोग के बाद किसानों तक पहुंचेंगी किस्में
वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि यहां किए जा रहे प्रयोग सफल होंगे. इसके बाद शकरकंद के क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाओं के साथ मिलकर इन किस्मों को किसानों तक पहुंचाया जाएगा. इससे सबसे ज्यादा फायदा आगरा के किसानों को होने की उम्मीद है. यहां आलू की खेती करने वाले 60 फीसदी से अधिक किसान साल में केवल एक आलू की फसल ही लेते हैं. ऐसे में उन्हें वर्षा के पानी से होने वाली और आलू की फसल से पहले एक और फसल करने का विकल्प मिल सकेगा.
छह माह में तैयार होगा अनुसंधान केंद्र
डॉ. सुधांशु सिंह ने बताया कि सींगना में अनुसंधान केंद्र के निर्माण का काम तेजी से चल रहा है. इसके अगले छह माह में पूरा होने की उम्मीद है. केंद्र तैयार होने के बाद यहां आलू की विभिन्न किस्मों पर भी शोध किए जाएंगे. इसके साथ ही किसानों को ट्रेनिंग और कार्यशालाओं के माध्यम से प्रशिक्षण दिया जाएगा. इस केंद्र से प्रदेश और देश के किसानों के साथ दक्षिण एशिया के देशों के किसानों को भी लाभ मिलेगा.
