Rourkela News: एनआइटी राउरकेला के शोधार्थियों ने विकसित की बाये इंक, हड्डियों और उपास्थि की मरम्मत में प्रभावी ढंग से किया जा सकता है उपयोग

Rourkela News: एनआइटी राउरकेला के शोधार्थियों ने थ्री-डी प्रिंटिंग के लिए उन्नत बायो-इंक का पेटेंट कराया है.

Rourkela News: राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआइटी) राउरकेला की टीम ने एक नया बायो-इंक विकसित किया है. बायो-इंक ऐसा पदार्थ होता है, जिनका उपयोग थ्री डी बायोप्रिंटिंग में ऊतक जैसी संरचनाएं बनाने के लिए किया जाता है. हालांकि ऐसे बायो-इंक की कमी के कारण, जिनमें यांत्रिक मजबूती, जैविक अनुकूलता और प्रिंट करने की क्षमता का मेल हो, इस तकनीक का व्यापक उपयोग अभी भी सीमित है. इस चुनौती से निपटने के लिए एनआइटी राउरकेला के जैव प्रौद्योगिकी और चिकित्सा इंजीनियरिंग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर प्रो देवेंद्र वर्मा ने अपनी शोध छात्रा श्रेया चरुंगू और डॉ तन्मय भारद्वाज के साथ मिलकर एक उच्च आकार-विश्वसनीयता (हाई शेप फिडिलिटी) वाला प्रोटीन-पॉलीसैकराइड बायो-इंक विकसित किया है, जिसका उपयोग हड्डियों और उपास्थि की मरम्मत में प्रभावी ढंग से किया जा सकता है.

इंटरनेशनल जर्नल ऑफ बायोलॉजिकल मैक्रोमोलेक्यूल्स प्रकाशित हुआ निष्कर्ष

इस शोध के निष्कर्ष प्रतिष्ठित ‘इंटरनेशनल जर्नल ऑफ बायोलॉजिकल मैक्रोमोलेक्यूल्स’ में प्रकाशित किये गये हैं. अनुसंधान टीम ने विकसित तकनीक के लिए थ्री डी बायोप्रिंटिंग के लिए एक उच्च आकार-विश्वसनीयता वाला प्रोटीन-पॉलीसैकराइड मिश्रित बायो-इंक शीर्षक से एक पेटेंट (पेटेंट संख्या: 583759; आवेदन संख्या: 202431019470) भी हासिल किया है. वहीं वांछित परिणाम प्राप्त करने के लिए अनुसंधान टीम ने बोवाइन सीरम एल्ब्यूमिन (बीएसए), सोडियम एल्गिनेट, और जिलेटिन तथा चिटोसन (पीइसी-जीसी) के पॉलीइलेक्ट्रोलाइट कॉम्प्लेक्स को आपस में मिलाया. इस मिश्रण से एक ऐसा जैव-सक्रिय तंत्र (बायो एक्टिव सिस्टम) तैयार हुआ, जिसने प्रिंटिंग प्रक्रिया के दौरान और उसके बाद भी संरचनात्मक अखंडता को बनाये रखते हुए कोशिकाओं के विकास में सहायता की.

प्रिंट करने की क्षमता और जैविक परफॉर्मेंस के बीच अंतर को पाटना था उद्देश्य

प्रो देवेंद्र वर्मा ने कहा कि हमारा मकसद बायो-इंक में प्रिंट करने की क्षमता और जैविक परफॉर्मेंस के बीच लंबे समय से चले आ रहे अंतर को भरना था. प्रोटीन-पॉलीसैकराइड के आपसी मेल को नैनोफाइबर कॉम्प्लेक्स के साथ मिलाकर, हमने एक ऐसा सिस्टम बनाया है, जो न सिर्फ बहुत बारीकी से प्रिंट करता है, बल्कि कोशिकाओं के काम और ऊतकों के फिर से बनने में भी सक्रिय रूप से मदद करता है. इससे हम चिकित्सकीय रूप से उपयोगी बायोप्रिंटेड संरचनाओं के एक कदम और करीब पहुंच गये हैं. लैब-स्केल ट्रायल में रिसर्च टीम ने पाया कि विकसित बायोइंक हड्डी के ऊतकों के एक्स्ट्रासेल्युलर मैट्रिक्स की नकल करता है, कोशिकाओं के जुड़ने के लिए जगह देता है और कोशिकाओं के चिपकने, बढ़ने और कुल मिलाकर जैविक प्रतिक्रिया को बढ़ावा देता है. इसके अलावा, प्रिंट किये गये स्कैफोल्ड में मजबूत यांत्रिक गुण पाये गये, जो प्रिंटिंग के बाद भी उनके आकार और काम करने की क्षमता को बनाये रखने में मदद करते हैं.

पशु अध्ययन करने की योजना बना रहा शोध दल

प्रयोगों से पता चला है कि 2 फीसदी पीइसी-जीसी वाले स्कैफोल्ड में 90 फीसदी से ज्यादा कोशिकाओं की जीवित रहने की दर (सेल वियाबिलिटी) हासिल हुई. इसके अलावा इसने हड्डी के ऊतकों के बनने और कोलेजन संश्लेषण की क्षमता भी दिखायी. विकसित बायोइंक की असल दुनिया में उपयोगिता के बारे में बताते हुए रिसर्च स्कॉलर श्रेया चरुंगू ने कहा कि विकसित बायोइंक, बनाने के लिए एक बहुमुखी मंच प्रदान करता है. सटीक ज्यामिति और जैविक कार्यक्षमता वाले रोगी-विशिष्ट ढांचे. उच्च कोशिका जीवन क्षमता और ऊतक-समान व्यवहार को बनाये रखने की इसकी क्षमता इसे पुनर्योजी चिकित्सा में अनुप्रयोगों के लिए आशाजनक बनाती है. अगले चरण के रूप में शोध दल विकसित बायो-इंक की सुरक्षा और प्रभावकारिता को और अधिक स्थापित करने के लिए पशु अध्ययन करने की योजना बना रहा है, जिसके बाद सत्यापन के लिए नैदानिक अध्ययन किये जायेंगे.

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By BIPIN KUMAR YADAV

BIPIN KUMAR YADAV is a contributor at Prabhat Khabar.

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