Rourkela News: करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी ‘आमको सिमको’ शहीद स्थल उपेक्षित
Rourkela News: आमको सिमको शहीद स्थल रखरखाव के अभाव में उपेक्षित है. इसकी चहारदीवारी टूट रही है और टाइल्स उखड़ रही है.
Rourkela News: तीन अप्रैल, 1919 को ब्रिटिश सरकार ने अमृतसर में स्वतंत्रता सेनानियों पर गोलियां चलवायी थी. इतिहास के पन्नों में इसे जलियांवाला बाग हत्याकांड के नाम से जाना जाता है. ब्रिटिश सरकार ने जलियांवाला बाग की तरह ही ओडिशा के सुंदरगढ़ जिले के रायबाेगा स्थित ‘आमको सिमको’ में आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों पर भी गोलियां चलवायी थीं. इसमें स्वतंत्रता सेनानी निर्मल मुंडा समेत 49 लोग शहीद हुए थे और कई अन्य घायल हुए थे. इसे आमको-सिमको के नाम से जाना जाता है. राज्य सरकार ने आमको सिमको शहीद स्थल को पर्यटन स्थल का दर्जा दिया है, लेकिन अब भी यह उपेक्षित हालत में है.
25 अप्रैल 1939 को अंग्रेजों ने आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों पर चलवायी थी गोलियां
शहीदों की धरती सुंदरगढ़ के इतिहास के पन्नों में बहादुर आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों का योगदान सुनहरे अक्षरों में लिखा है. जलियांवाला बाग हत्याकांड के ठीक 20 साल बाद 25 अप्रैल 1939 को अंग्रेजों ने रायबोगा के आमको सिमको में आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों पर गोलियां चलवायी थी. इसमें 49 स्वतंत्रता सेनानी शहीद हुए और कई घायल हुए. इस स्थल के सौंदर्यीकरण पर सरकार ने चार करोड़ रुपये खर्च किये थे. लेकिन यह पूरी तरह विकसित नहीं हो पाया. यह सिर्फ बाहर से चमकदार है, लेकिन अंदर से पूरी तरह उपेक्षित है. यहां के विकास के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए गए, लेकिन रखरखाव के अभाव में सब कुछ बदहाल होता जा रहा है. चारों तरफ बनी बाउंड्री वाल अब टूटने की हालत में है, जो टाइल्स लगायी गयी थीं, वे धीरे-धीरे उखड़ रही हैं. 55 लोगों के नाम के अलावा पत्थरों पर कोई तस्वीर या मूर्ति नहीं है.
4.80 करोड़ से शहीद स्थल के विकास को 2020 में किया गया था शिलान्यास
मौजूदा केंद्रीय आदिवासी कल्याण मंत्री और उस समय के सुंदरगढ़ सांसद जुएल ओराम ने 2020 में चार करोड़ रुपये की लागत से आमको सिमको शहीद स्थल के विकास के लिए शिलान्यास किया था. इसके साथ ही, उस समय की राज्य सरकार के पर्यटन विभाग ने 80 लाख रुपये खर्च किये थे. काम पर कुल 4.8 करोड़ रुपये खर्च हुए, लेकिन इलाके के लोगों ने शिकायत की है कि काम बहुत घटिया क्वालिटी का हुआ. लाइब्रेरी रूम, म्यूजियम, कंप्यूटर रूम, मीटिंग हॉल तो बन गये, लेकिन जब आप उस शहीद स्थल के आस-पास का नजारा देखने जाते हैं, तो यहां ठेकेदारों और विभागीय अधिकारियों के कारनामों का पता चलता है. काम में कई खामियां हैं. यहां बनी दीवारें टूट रही हैं, बिल्डिंग से सीमेंट झड़ने लगी है. टाइल्स टूट रही हैं. यहां तक कि चलने के लिए बिछाई गयी टाइल्स भी उखड़ रही हैं. स्थानीय ग्रामीणों की शिकायत है कि काम को देखने वाला कोई नहीं है. विभागीय अधिकारी सही से निगरानी नहीं करते.
25 अप्रैल को शहीद दिवस के दिन ही नजर आते हैं अधिकारी व जनप्रतिनिधि
पांच साल बाद भी यहां सुधार का काम पूरा नहीं हुआ है. काम में कमियां लोगों के सामने आ चुकी हैं. लोगों की शिकायतों के मुताबिक, हर साल 25 अप्रैल को ‘आमको-सिमको’ शहीद दिवस मनाया जाता है. इस दिन नेता, राजनेता और कई प्रशासनिक अधिकारी यहां नजर आते हैं. वरना, इस शहीद स्थल की तरफ कोई झांकता तक नहीं. आज तक शहीद के परिवारों को पूरा सम्मान तक नहीं मिल पाया है.