रांची: झारखंड में इंसान और गजराज के बीच टकराव लगातार गंभीर होता जा रहा है. जंगलों से निकलकर गांवों और खेतों तक पहुंच रहे हाथियों के झुंड कई इलाकों में ग्रामीणों के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं. सोमवार को रामगढ़ के रजरप्पा थाना क्षेत्र के बड़कीपोना गांव में करीब 15 हाथियों का झुंड घुस गया. हाथियों के हमले में दो महिलाओं की मौत हो गयी, जबकि एक महिला और एक पुरुष के घायल होने की सूचना है. वन विभाग और पुलिस की टीम मौके पर पहुंची और ग्रामीणों को हाथियों से दूर रहने की चेतावनी दी.
यह घटना अकेली नहीं है. झारखंड में पिछले कुछ महीनों में पश्चिमी सिंहभूम, हजारीबाग, रामगढ़, पूर्वी सिंहभूम समेत कई इलाकों से हाथियों के हमले में ग्रामीणों की मौत की खबरें सामने आती रही हैं. सवाल यह है कि आखिर इंसान और गजराज के बीच संघर्ष लगातार क्यों बढ़ रहा है?
23 साल में 1,340 लोगों की मौत
मानव-हाथी संघर्ष की भयावहता का अंदाजा एक दीर्घकालिक अध्ययन से लगाया जा सकता है. झारखंड के 22 वन प्रमंडलों में वर्ष 2000 से 2023 के बीच दर्ज 1,740 संघर्ष घटनाओं के अध्ययन में 1,340 लोगों की मौत और 400 लोगों के घायल होने की बात सामने आयी है. अध्ययन के मुताबिक रांची क्षेत्र में सबसे अधिक 391 मौतें दर्ज हुईं. इसके बाद खूंटी में 131, पूर्वी सिंहभूम में 68, हजारीबाग में 58 और पलामू में 48 मौतें दर्ज की गयीं.
इससे साफ है कि मानव-हाथी संघर्ष झारखंड के कुछ चुनिंदा वन क्षेत्रों में वर्षों से गंभीर समस्या बना हुआ है. वहीं हाल की घटनाओं ने पश्चिमी सिंहभूम और रामगढ़ जैसे इलाकों में तत्काल खतरे को फिर सामने ला दिया है.
पश्चिमी सिंहभूम में एक हाथी ने मचाया था कहर
2026 की शुरुआत में पश्चिमी सिंहभूम में एक जंगली हाथी के लगातार हमलों ने पूरे राज्य को झकझोर दिया था. जनवरी में सामने आयी रिपोर्टों के मुताबिक महज 21 दिनों में राज्य में 22 लोगों की मौत हाथी हमलों में हुई थी. इनमें पश्चिमी सिंहभूम में एक हाथी के हमले से हुई कई मौतें शामिल थीं.
वहीं हजारीबाग में भी हाथियों के झुंड के हमले ने कई परिवारों को उजाड़ दिया. ऐसे घटनाक्रम बताते हैं कि जब कोई झुंड या हाथी आबादी के आसपास लंबे समय तक सक्रिय रहता है, तो ग्रामीणों के लिए खतरा लगातार बना रहता है.
रामगढ़ में फिर लौटा हाथियों का खतरा
रामगढ़ की सोमवार की घटना इस समस्या का ताजा उदाहरण है. प्रभात खबर की रिपोर्ट के अनुसार, शावकों समेत करीब 15 हाथियों का झुंड सुबह बड़कीपोना गांव में पहुंच गया. डाड़ीटुंगरी में कृषि कार्य कर रहीं भानो देवी और सबीना खातून की हाथियों के हमले में मौत हो गयी. झुंड इसके बाद बड़कीपोना रेलवे स्टेशन और ईदगाह मैदान की ओर बढ़ गया. कुछ लोग हाथियों का वीडियो बनाने के लिए उनके करीब भी पहुंच रहे थे, जिसके बाद पुलिस और वन विभाग ने लोगों को दूर रहने की चेतावनी दी.
यह घटना बताती है कि खतरा सिर्फ जंगल की सीमा तक सीमित नहीं है. हाथियों के झुंड अब गांव, खेत, सड़क और रेलवे लाइन के आसपास भी पहुंच रहे हैं.
आखिर गांवों में क्यों पहुंच रहे हाथी?
विशेषज्ञों के अनुसार मानव-हाथी संघर्ष के पीछे कई कारण हैं. जंगलों का विखंडन, खेती और बस्तियों का विस्तार, सड़क-रेल जैसी आधारभूत संरचनाएं तथा हाथियों के पारंपरिक आवागमन वाले रास्तों में बदलाव संघर्ष बढ़ाने वाले प्रमुख कारणों में शामिल हैं. शोध में यह भी सामने आया है कि जंगल और इंसानी आबादी के बीच बढ़ता संपर्क हाथियों के लिए भोजन और आवागमन की तलाश में गांवों की ओर जाने की स्थिति पैदा करता है.
झारखंड में धान और दूसरी फसलों वाले खेत भी हाथियों को आकर्षित करते हैं. जंगल के किनारे बसे गांवों में फसल बर्बादी के साथ ग्रामीणों की जान का खतरा भी बढ़ जाता है.
सिर्फ हाथी भगाने से नहीं निकलेगा समाधान
मानव-हाथी संघर्ष को रोकने के लिए केवल हाथियों को एक जगह से दूसरी जगह खदेड़ना स्थायी समाधान नहीं है. जरूरत हाथियों के पारंपरिक रास्तों और कॉरिडोर को सुरक्षित रखने, संवेदनशील गांवों में समय रहते अलर्ट पहुंचाने, बिजली के खतरनाक तारों और दूसरे मानव निर्मित जोखिमों को कम करने तथा वन विभाग की त्वरित प्रतिक्रिया व्यवस्था मजबूत करने की है.
इस संघर्ष में नुकसान केवल इंसानों का नहीं होता. अध्ययन के मुताबिक इसी अवधि में झारखंड में 225 हाथियों की भी मौत हुई. बिजली का करंट, रेलवे दुर्घटना और अन्य मानवीय गतिविधियां हाथियों के लिए भी जानलेवा साबित हुई हैं.
अब सवाल समाधान का है
रांची, खूंटी, पूर्वी सिंहभूम, हजारीबाग, पश्चिमी सिंहभूम और रामगढ़ जैसे इलाकों से लगातार सामने आती घटनाएं बताती हैं कि झारखंड में मानव-हाथी संघर्ष को अब केवल अलग-अलग घटनाओं के रूप में देखने के बजाय एक राज्यव्यापी पर्यावरण और जनसुरक्षा समस्या के रूप में देखना होगा.
आज बड़कीपोना में दो महिलाओं की मौत ने फिर वही सवाल खड़ा किया है—क्या हर बार हाथी के गांव में पहुंचने के बाद ही प्रशासन सक्रिय होगा, या संवेदनशील गांवों में उससे पहले सुरक्षा की ऐसी व्यवस्था बनेगी, जिससे अगली जान बचायी जा सके?
