खरसावां. कभी मुंबई की चकाचौंध के बीच दिहाड़ी मजदूरी करने वाले खरसावां के नारायणपुर गांव के किसान खेत्रो मोहन साहू ने अपनी मेहनत और आधुनिक तकनीकों के दम पर कृषि को एक नया आयाम दे दिया है. आज उनकी लहलहाती फसलें और जैविक खेती का मॉडल आसपास के किसानों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गया है.
2016 में गांव लौटकर खेती को बनाया हथियार
करीब दस वर्षों तक मुंबई में दिहाड़ी मजदूर के रूप में संघर्ष करने के बाद खेत्रो मोहन वर्ष 2016 में अपने पैतृक गांव लौटे. शुरुआत में उन्होंने पारंपरिक तरीके से खेती की, लेकिन जल्द ही वैज्ञानिक विधियों को अपनाकर अपनी तकदीर बदल डाली. वर्तमान में उनके खेतों में वीएनआर-212 किस्म के ग्राफ्टेड बैंगन की बंपर फसल लहलहा रही है, जिससे प्रति सप्ताह लगभग दो क्विंटल उत्पादन मिल रहा है.
इजरायली तकनीक व कचरे से खाद बनाने का अनोखा हुनर
भले ही वह वर्ष 2018 में तकनीकी प्रशिक्षण के लिए इजरायल नहीं जा सके, लेकिन वहां की उन्नत कृषि तकनीकों का अध्ययन कर उन्होंने अपने खेतों में सिंचाई और उत्पादन के नए तरीके अपनाए. खेत की उर्वरा शक्ति बनाए रखने के लिए वे रासायनिक खादों के बजाय घर के जैविक कचरे, सूखे पत्तों और गोबर से दो महीने में उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद तैयार करते हैं.
मिल चुका है उन्नत कृषक का सम्मान
फसलों को कीटों से बचाने के लिए वे रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भर नहीं रहते, बल्कि नीम की पत्तियों और गोमूत्र से प्राकृतिक कीटनाशक तैयार करते हैं. उनकी इस जैविक पहल और बेहतरीन सब्जी उत्पादन के लिए कृषि विभाग द्वारा उन्हें कई बार सम्मानित किया जा चुका है. खेत्रो मोहन का यह सफल सफर साबित करता है कि लगन और तकनीक से किसानी को भी एक अत्यधिक लाभकारी व्यवसाय बनाया जा सकता है.
