खरसावां : पहाड़ की तलहटी में फैले खेत, मिट्टी में दबी सुनहरी गांठें और उन्हें खोदते आदिवासी किसानों के हाथ...रायजामा में हल्दी सिर्फ एक फसल नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा और ग्रामीण जीवन का हिस्सा है. सरायकेला-खरसावां जिले के खरसावां प्रखंड मुख्यालय से करीब 15 किलोमीटर दूर जनजातीय बहुल रायजामा गांव की देसी हल्दी अब अपनी खास गुणवत्ता के कारण जिले की सीमाओं से बाहर भी पहचान बना रही है. यहां किसान पारंपरिक तरीके से बिना रासायनिक उर्वरक के हल्दी की खेती करते हैं. इसकी खासियत यह है कि रायजामा की ऑर्गेनिक हल्दी में सात फीसदी से अधिक करक्यूमिन पाया गया है, जबकि सामान्य हल्दी में इसकी मात्रा करीब दो से ढाई फीसदी बतायी जाती है.
करक्यूमिन ने बढ़ायी हल्दी की खासियत
हल्दी में पाया जाने वाला करक्यूमिन इसका प्रमुख सक्रिय तत्व है. वैज्ञानिक अध्ययनों में करक्यूमिन के एंटीऑक्सीडेंट और सूजनरोधी गुणों का उल्लेख मिलता है. यही वजह है कि हल्दी भारतीय खान-पान के साथ पारंपरिक घरेलू उपयोग में भी लंबे समय से महत्वपूर्ण रही है. रायजामा की हल्दी में करक्यूमिन की अधिक मात्रा इसे सामान्य हल्दी से अलग पहचान देती है. गुणवत्ता की यह विशेषता किसानों के लिए बाजार में बेहतर संभावनाओं की उम्मीद भी जगा रही है.
रायजेमा से गोमियाडीह तक सुनहरी फसल
खरसावां के रायजामा से लेकर कुचाई के गोमियाडीह तक पहाड़ियों की तलहटी में बसे कई गांवों में हल्दी की खेती होती है. रायजेमा, कांडेरकुटी, चैतनपुर, सीलाडीह, इचाडीह, पोडाडीह और जोरा समेत करीब दर्जन भर गांवों के किसान इस खेती से जुड़े हैं. स्थानीय लोगों के अनुसार इन इलाकों में आजादी से पहले से हल्दी की खेती की परंपरा चली आ रही है. किसानों का कहना है कि यहां की जमीन, मौसम और स्थानीय कृषि परिस्थितियां हल्दी की खेती के लिए अनुकूल हैं. रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होने और पारंपरिक कृषि पद्धति अपनाने से तैयार होने वाली हल्दी की अपनी अलग पहचान बनी हुई है.
गांठ से पाउडर तक गांव में हो रही प्रोसेसिंग
पहले किसान खेत से निकली हल्दी की गांठ को सुखाकर अपने स्तर से पाउडर तैयार करते थे और स्थानीय हाट-बाजारों में बेच देते थे. इससे किसानों को अपनी उपज का अपेक्षित मूल्य नहीं मिल पाता था. अब हल्दी की स्थानीय स्तर पर प्रोसेसिंग कर उसे पाउडर के रूप में तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है. गांव में ही हल्दी की सफाई, सुखाने और पिसाई की प्रक्रिया से किसानों को अपनी उपज का मूल्य बढ़ाने का अवसर मिल रहा है. सामान्य तौर पर करीब चार किलो कच्ची हल्दी की गांठ से लगभग एक किलो हल्दी पाउडर तैयार होने की बात बतायी जाती है. अब प्रोसेसिंग के साथ पैकेजिंग और ब्रांडिंग की बेहतर व्यवस्था विकसित की गयी है. इससे किसानों को स्थानीय बाजार के बजाय बड़े बाजारों तक पहुंच बनाने में मदद मिल रही है.
मसाले से आगे, ग्रामीण समृद्धि की उम्मीद
रायजेमा और आसपास के गांवों के किसानों के लिए हल्दी केवल रसोई का मसाला नहीं है. यह उनकी कृषि परंपरा, मेहनत और आय का जरिया है. अब इसकी गुणवत्ता को बाजार से जोड़ने की कोशिशों ने किसानों के सामने नई संभावनाएं पैदा की हैं. देश के विभिन्न हिस्सों में रायजामा की हल्दी की मांग बढ़ने से स्थानीय किसानों में उत्साह है. किसानों का मानना है कि यदि खेती के साथ प्रोसेसिंग, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और बाजार की व्यवस्था गांव स्तर पर ओर अधिक मजबूत हो जाए, तो हल्दी की खेती उनकी आमदनी बढ़ाने का बेहतर माध्यम बन सकती है.
ग्रामीण अर्थव्यवस्था का बन सकती है मजबूत आधार
पहाड़ की तलहटी में पीढ़ियों से मिट्टी में दबकर तैयार होती रही रायजामा की यह सुनहरी फसल अब खेत से बाजार तक पहुंचने की नई राह पर निकल चुकी है. करक्यूमिन की खासियत और पारंपरिक खेती की पहचान के साथ यह देसी हल्दी आने वाले दिनों में रायजामा की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार बन सकती है.
