जंगल से कमाई का नया रास्ता, 34 एकड़ बागान में शुरू होगी तसर पालन की बड़ी पहल, 50 किसानों को मिला प्रशिक्षण

सरायकेला-खरसावां के डुमरडीहा और बुरुडीह में 34 एकड़ बागान से तसर उत्पादन शुरू. किसानों को मिली वैज्ञानिक ट्रेनिंग, रेशम पालन से बढ़ेगी ग्रामीणों की आय.

खरसावां : जंगल और प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध सरायकेला-खरसावां जिले के ग्रामीण इलाकों में तसर पालन को आजीविका और स्वरोजगार का नया जरिया बनाने की पहल शुरू हो गयी है. मनरेगा के तहत विकसित 34 एकड़ बागान को तसर पालन से जोड़कर ग्रामीणों की आय बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं. इसी कड़ी में केंद्रीय रेशम बोर्ड के राष्ट्रीय अभियान ‘मेरा रेशम मेरा अभिमान 2.0 के तहत राजनगर प्रखंड के डुमरडीहा और बुरुडीह गांव में किसान-वैज्ञानिक विचार-विमर्श सह क्षेत्र भ्रमण कार्यक्रम आयोजित किया गया. इसमें करीब 50 महिला व युवा किसानों ने भाग लिया.

34 एकड़ ब्लॉक प्लांटेशन में दिखी तसर उत्पादन की मजबूत संभावना

कार्यक्रम के दौरान डुमरडीहा और बुरुडीह में वर्ष 2022 में मनरेगा के तहत विकसित 34 एकड़ के ब्लॉक प्लांटेशन का विशेषज्ञों द्वारा संयुक्त सर्वेक्षण किया गया. अधिकारियों ने बागान का निरीक्षण कर बताया - इस सार्वजनिक बागान का समुचित उपयोग कर बड़े पैमाने पर तसर उत्पादन किया जा सकता है. इससे स्थानीय स्तर पर ग्रामीणों के लिए स्थायी आजीविका के नए द्वार खुलेंगे.

वैज्ञानिकों ने दिये कीट प्रबंधन और पालन तकनीक के टिप्स

सेंट्रल सिल्क बोर्ड (बीएसएमटीसी) खरसावां के वैज्ञानिक-बी डुकरे प्रदीप गुलाबराव और पीपीसी खरसावां की तकनीकी टीम ने किसानों को वैज्ञानिक पद्धति से तसर कीड़ा पालन की विस्तृत जानकारी दी. इसमें होस्ट प्लांट के बेहतर प्रबंधन, स्वच्छता तथा कीटों व बीमारियों से बचाव के उपायों पर विशेष जोर दिया गया. किसानों की शंकाओं और सवालों का विशेषज्ञों ने मौके पर ही समाधान किया.

महिला और युवा किसानों को आत्मनिर्भर बनाने पर जोर

स्थानीय जनप्रतिनिधियों व विशेषज्ञों ने महिला और युवा किसानों को तसर पालन अपनाकर आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित किया. विशेषज्ञों ने विश्वास जताया कि डुमरडीहा-बुरुडीह का यह 34 एकड़ बागान हरित आजीविका का एक सफल मॉडल बनेगा, जिससे प्रेरित होकर आसपास के गांवों में भी रेशम उत्पादन का विस्तार होगा.

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लेखक के बारे में

By शचिंद्र कुमार दाश

शचिंद्र कुमार दाश प्रभात खबर के वरीय संवाददाता हैं और हिंदी पत्रकारिता में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखते हैं। वे झारखंड और ओडिशा की राजनीति, प्रशासन, ग्रामीण विकास, सामाजिक सरोकार, कानून-व्यवस्था तथा जनहित से जुड़े मुद्दों की रिपोर्टिंग करते हैं। इसके साथ ही कला, भाषा, संस्कृति, आध्यात्म और समसामयिक विषयों पर लेखन में उनकी विशेष रुचि है। नई जानकारियां जुटाना और उन्हें प्रमाणिक तथ्यों के साथ पाठकों तक पहुंचाना उनकी कार्यशैली की प्रमुख विशेषता है। उनकी रिपोर्टिंग राजनीति, सामाजिक मुद्दों, शिक्षा, खेल, पर्यावरण, साहित्य, संस्कृति से जुड़े विषयों को समेटती है। शचिंद्र कुमार दाश ग्राउंड रिपोर्टिंग पर विशेष जोर देते हैं। वे घटनास्थल पर पहुंचकर तथ्यों के आधार पर समाचार प्रस्तुत करने तथा आम लोगों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाने का प्रयास करते हैं।

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