ओलचिकी लिपि से संताली साहित्य का विकास संभव : चुंडा सोरेन सिपाही
साहिबगंज
पंचगढ़ स्वयंवर सभागार में रविवार को साहित्य संगोष्ठी सह सम्मेलन आयोजित हुआ. मुख्य अतिथि चुण्डा सोरेन सिपाही ने कहा कि संताल समुदाय की भाषा और संस्कृति विश्वभर में समान है, जो उनकी एकता को दर्शाती है. ओलचिकी लिपि के माध्यम से संताली साहित्य का संरक्षण और विकास संभव है, जिस पर सभी को गर्व होना चाहिए. इसकी शुरुआत सिदो-कान्हू और पंडित रघुनाथ मुर्मू के चित्र पर माल्यार्पण व दीप प्रज्वलन से हुई. साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता भुजंग टुडू ने कहा कि संताली साहित्य तेजी से विकसित हो रहा है और युवाओं को इससे प्रेरणा लेकर आगे बढ़ना चाहिए. झारखंड शाखा के अध्यक्ष रजनीकांत माण्डी ने बताया कि ओलचिकी लिपि के 100 वर्ष पूरे होने पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा पंडित रघुनाथ मुर्मू के सम्मान में डाक टिकट व स्मारक सिक्का जारी किया गया, जो गर्व की बात है. केंद्रीय कमेटी के उपाध्यक्ष मानिक हांसदा ने साहित्य के संरक्षण को बड़ी चुनौती बताया. संगोष्ठी में चुण्डा सोरेन सिपाही की पुस्तक “संताली रोनोड़ “, पत्रिका “फुरगाल आड़ाङ “, शिवलाल मरांडी की “कोयोक दाराम ” और स्मारिका का लोकार्पण किया गया. संचालन सुशील हांसदा ने किया तथा धन्यवाद नाजिर हेंब्रम ने दिया. मौके पर मसीह मरांडी परगाना, सामुएल मुर्मू, क्लेमेंट सोरेन, अगस्टीन हेंब्रम, बुढ़ान चंद्र मुर्मू, विजय लाल मारांडी, शिबू टुडू, गोपीन किस्कू, मनोज टुडू, मंजू हांसदा, पुष्पा हेंब्रम, नितिन कान्हू हांसदा, रवींद्र मरांडी, टेकलाल मारांडी, सुशील सोरेन, सोनी किस्कू, मेरी मुर्मू, सुंदरलाल सोरेन, विनय टुडू, बादल हेंब्रम, सुधीर चंद्र सोरेन, कालीदास मुर्मू आदि मौजूद थे.
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