एस. सुरेश कुमार पिल्लई की रिपोर्ट, वैज्ञानिक, बीरबल साहनी पुरावनस्पति विज्ञान संस्थान, लखनऊ
संताल परगना: झारखंड की राजमहल पहाड़ियां सिर्फ प्राकृतिक सुंदरता, झरनों और मंदिरों के लिए प्रसिद्ध नहीं हैं, बल्कि ये पृथ्वी के प्राचीन इतिहास की अनमोल धरोहर हैं. साहिबगंज जिले से लेकर दुमका तक फैली ये पहाड़ियां धरती के करोड़ों वर्ष पुराने भूगर्भीय बदलावों की गवाह हैं. राजमहल बेसिन संथाल परगना प्रमंडल के सबसे पूर्वी हिस्से में स्थित है और साहिबगंज, पाकुड़, गोड्डा व दुमका जिलों तक फैला हुआ है.
इन पहाड़ियों की औसत ऊंचाई 200 से 300 मीटर (660-980 फीट) है. गंगा नदी इन पहाड़ियों के चारों ओर घूमती हुई बहती है और यहां इसकी दिशा पूर्व से दक्षिण की ओर बदल जाती है. राजमहल बेसिन करीब 10,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है और यह राजमहल-मालदा-पूर्णिया मास्टर बेसिन का हिस्सा है. भूवैज्ञानिक दृष्टि से यह क्षेत्र प्रारंभिक क्रेटेशियस काल की चट्टानों के लिए महत्वपूर्ण है. यहां की संरचनाओं को राजमहल फॉर्मेशन के अंतर्गत वर्गीकृत किया गया है, जिसमें ज्वालामुखीय और अवसादी दोनों प्रकार की चट्टानें मिलती हैं.
ज्वालामुखी, लावा और चट्टानों में दर्ज करोड़ों साल का इतिहास
राजमहल फॉर्मेशन में इंटरकैलेटेड ट्रैप (ज्वालामुखीय चट्टानें) और इंटरट्रैपियन (अवसादी परतें) पाई जाती हैं. यहां बेसाल्टिक लावा प्रवाह के साथ बलुआ पत्थर, शेल, चर्ट, सिल्टस्टोन और मिट्टी की परतें मौजूद हैं. वैज्ञानिक घोष और अन्य (1996) ने राजमहल क्षेत्र में 15 सतही बेसाल्टिक प्रवाह और 28 भूमिगत लावा प्रवाह की पहचान का उल्लेख किया है, जो इस क्षेत्र में हुई व्यापक ज्वालामुखीय गतिविधियों के प्रमाण हैं.
राजमहल बेसिन की ऊपरी गोंडवाना चट्टानों में ज्वालामुखीय और अवसादी परतों का क्रम मिलता है. वैज्ञानिकों के अनुसार यहां की ज्वालामुखीय गतिविधियां गोंडवाना भूभाग के टूटने के दौरान भारतीय उपमहाद्वीप में हुई रिफ्टिंग (धरती की सतह में दरार) और भूपर्पटी के फैलाव का परिणाम थीं.
धरती का बदलता स्वरूप
राजमहल और डेक्कन ट्रैप के आइसोटोप अध्ययन से पता चलता है कि दोनों की उत्पत्ति अलग-अलग स्रोतों से हुई थी और ये भारतीय प्लेट के विखंडन इतिहास की अलग-अलग घटनाओं से जुड़ी थीं. डेक्कन क्षेत्र की ज्वालामुखीय गतिविधियां मेडागास्कर से भारतीय प्लेट के अलग होने से संबंधित मानी जाती हैं, जबकि राजमहल की गतिविधियां भारत के पूर्वी हिस्से में अंटार्कटिका और ऑस्ट्रेलिया से अलगाव के शुरुआती दौर में भूपर्पटी के फैलाव से जुड़ी मानी जाती हैं. राजमहल फॉर्मेशन कुछ स्थानों पर दुबराजपुर फॉर्मेशन (प्रारंभिक ट्राइसिक से प्रारंभिक क्रेटेशियस काल) से जुड़ा है, जबकि अन्य स्थानों पर यह बराकर फॉर्मेशन (प्रारंभिक पर्मियन काल) और प्रीकैम्ब्रियन बेसमेंट के ऊपर स्थित है. इस तरह राजमहल हिल्स केवल पहाड़ियां नहीं, बल्कि धरती के विकास क्रम की खुली प्रयोगशाला हैं, जहां हर चट्टान करोड़ों वर्षों पुरानी भूगर्भीय कहानी अपने भीतर समेटे हुए है.
इस परिशिष्ट में इसी संस्थान के सूरज कुमार साहू, बिपिन मैथ्यू, अखिल मनवाल, अनीता चट्टोराज ने सहयोग दिया.
