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प्रवचन : गतिशील ध्यान से व्यक्ति जीता है तनावरहित जीवनबैठकर किये जाने वाले ध्यान की तकनीकों का भी ऐसा ही किंतु धीमा प्रभाव पड़ता है. उनसे व्यक्ति बिना किसी बाहरी सहायता पर निर्भर हुए स्वयं को बदलकर नई परिस्थितियों में ढाल सकता है. उसमें आत्म-निर्भरता तथा आंतरिक शक्ति विकसित होती है. यह उस बिंदु से चेतना के विकास की यात्रा प्रारंभ करता है जहां गतिशील ध्यान समाप्त होता है.परिणाम : जिस व्यक्ति ने गतिशील ध्यान को अपने मन की सतत अवस्था बना लिया है, उसके लिए जीवन का हर क्षण ध्यानमय है. भले ही वह सोया अथवा जागा हो, वह भावातीत अवस्था में रहता है. आंतरिक ज्ञान तथा दो क्षणों के बीच जहां समय तथा समयातीतता मिलते हैं, वहां उसकी पहुंच रहती है. वह हर क्षण सतर्क, सक्रिय तथा संतुलित रहता है. वह हर कार्य एकाग्रतापूर्वक, स्वयं को उसमें पूरी तरह खोकर अधिकतम प्रयास द्वारा तथा साथ ही पूर्णतया तनावरहित रहते हुए सजगतापूर्वक करता है. उसे दैनिक कार्यों में प्रयुक्त ध्यान की सक्रियता कहते हैं.

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