रांची: विश्व आदिवासी दिवस के मौके पर आजसू पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष सुदेश महतो ने कहा कि आदिवासी अधिकार केवल एक दिन के समारोह व भाषण तक सीमित नहीं हो सकते. आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन, पहचान, भाषा, संस्कृति और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा सरकार की जिम्मेदारी है. ऐसे में सरकार बताये कि आदिवासियों के अधिकार व भविष्य के लिए क्या किया है.
रोजगार, पलायन, विस्थापन पर खड़े किए सवाल
उन्होंने राज्य भर के आदिवासी समाज को इस दिवस की शुभकामनाएं दी. साथ ही कहा कि आज आदिवासी समाज के सामने रोजगार, पलायन, विस्थापन, शिक्षा, स्वास्थ्य और जमीन की सुरक्षा जैसे गंभीर सवाल खड़े हैं. सरकार को इन सवालों पर केवल घोषणाएं नहीं, बल्कि धरातल पर परिणाम दिखाना होगा.
अधिकारों और भविष्य को लेकर चिंतित
उन्होंने कहा कि जिस झारखंड की पहचान जल, जंगल और जमीन से है, उसी झारखंड के आदिवासी और मूलवासी आज अपने अधिकारों और भविष्य को लेकर चिंतित हैं. यह स्थिति सरकार की नीतियों पर गंभीर सवाल खड़ा करती है.
उत्सव का दिन नहीं, बल्कि आत्म मंथन, चिंता व संकल्प का
आजसू पार्टी के मुख्य प्रवक्ता व झारखंड आंदोलनकारी डॉ देवशरण भगत ने कहा कि एक झारखंड आंदोलनकारी और आदिवासी समाज के नेतृत्वकर्ता के रूप में आज का दिन मेरे लिए केवल उत्सव का नहीं, बल्कि आत्ममंथन, चिंता और संकल्प का दिन है.
झारखंड के लिए आंदोलनकारियों ने संघर्ष किया
जिस झारखंड के निर्माण के लिए आंदोलनकारियों ने संघर्ष और बलिदान दिया, उस झारखंड में आज भी आदिवासी समाज अपने मूल अधिकारों, पहचान और भविष्य को लेकर सवालों के बीच खड़ा है. डॉ भगत ने कहा कि झारखंड केवल एक भौगोलिक राज्य नहीं, बल्कि आदिवासी संघर्ष, संस्कृति, अस्मिता और बलिदान की ऐतिहासिक भूमि है.
बिरसा मुंडा, सिदो-कान्हू, चांद-भैरव, फूलो-झानो और हजारों आंदोलनकारियों के संघर्ष की बुनियाद पर झारखंड राज्य का निर्माण हुआ, लेकिन आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि राज्य बनने के बाद आदिवासी समाज को उसके संघर्ष का वास्तविक प्रतिफल कितना मिला.
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