रांची: विश्व हाथी दिवस के अवसर पर वन विभाग की ओर से कार्यशाला का आयोजन किया गया. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पीसीसीएफ हॉफ संजीव कुमार ने कहा कि कार्यशाला का उद्देश्य झारखंड में बढ़ते मानव-हाथी संघर्ष की चुनौतियों पर चर्चा करना और विशेषज्ञों, वन विभाग के पदाधिकारियों, वनरक्षियों, हाथी बचाव एवं प्रबंधन दलों तथा ग्रामीण समुदायों के अनुभव साझा करना है. साथ ही मानव और हाथियों के बीच सुरक्षित एवं टिकाऊ सह-अस्तित्व के लिए प्रभावी रणनीति तैयार करना भी कार्यशाला का उद्देश्य है.
हाथियों के आवागमन वाले मार्गों पर भोजन-पानी की व्यवस्था जरूरी
संजीव कुमार ने कहा कि हाथियों की समस्या केवल झारखंड तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका संबंध बिहार, पश्चिम बंगाल, ओड़िशा और छत्तीसगढ़ से भी है. झारखंड में लगभग 75 हाथियों के आवागमन के मुख्य मार्ग हैं. इन मार्गों पर चरागाह, भोजन और स्वच्छ पानी की व्यवस्था कर मानव-हाथी संघर्ष को कम किया जा सकता है. उन्होंने कहा कि भविष्य की किसी भी योजना या परियोजना को अगले 10 वर्षों की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार करना होगा.
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हाथियों की सुरक्षा के लिए तकनीक और संसाधनों पर जोर
पीसीसीएफ वन्य प्राणी रवि रंजन ने कहा कि लोग हाथियों को मनोरंजन के नजरिये से देखते हैं, जबकि वन विभाग हाथियों और ग्रामीणों दोनों की सुरक्षा के दृष्टिकोण से काम करता है. उन्होंने कहा कि हाथियों की सुरक्षा के लिए उन्नत तकनीक के साथ भोजन और पानी की व्यवस्था पर भी ध्यान देना जरूरी है. कार्यशाला में पीसीसीएफ एटी मिश्रा, सीसीएफ एसआर नटेश, पीआर नायडू, वीएस दुबे, शबा आलम, अजिंक्य बनकर, श्रीकांत वर्मा, अविनाश चौधरी, प्रशांत बासविकार, डॉ. बियास पांडेय, रुद्र महापात्र, डॉ. नवीन पांडेय, हितेन बैसिया समेत अन्य अधिकारी और विशेषज्ञ मौजूद थे.
