रांची में कोयला मंत्री की बड़ी घोषणा: देश की 147 बंद खदानों में होगी मखाना की खेती, SHG संभालेंगे कमान

Satish Chandra Dubey: रांची में आयोजित पहले क्लाइमेट सम्मेलन में कोयला राज्य मंत्री सतीश चंद्र दुबे ने 147 बंद खदानों के पुनरुद्धार और उनमें मखाना की खेती शुरू करने की योजना साझा की. जल पुरुष राजेंद्र सिंह ने बढ़ते जल संकट पर चिंता जताई. पूरी रिपोर्ट यहां पढ़ें.

Satish Chandra Dubey, रांची, (मनोज कुमार सिंह की रिपोर्ट): राजधानी रांची में ‘अबुआ अधिकार मंच’ द्वारा आयोजित पहले क्लाइमेट सम्मेलन में देश की पर्यावरणीय चुनौतियों और कोयला खदानों के पुनरुद्धार पर गहन मंथन हुआ. इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित केंद्र सरकार के कोयला राज्य मंत्री सतीश चंद्र दुबे ने घोषणा की कि देश में चिन्हित की गई 147 बंद कोयला खदानों के लिए ‘फाइनल क्लोजर प्लान’ तैयार किया जा रहा है.

बंद खदानों में होगी मखाना की खेती और वृक्षारोपण

कोयला राज्य मंत्री ने बताया कि बंद पड़ी खदानों को उनकी पूर्व स्थिति में लाने के लिए विशेष योजना पर काम चल रहा है. विकसित की गई खदानों की जमीन को स्वयं सहायता समूहों (SHG) को सौंपा जाएगा. इन जमीनों पर विदेशी पौधों के बजाय कटहल, आम और अन्य स्थानीय फलदार पौधे लगाए जाएंगे. बंद पड़ी खुली खदानों में अब मछली पालन के साथ-साथ मखाना की खेती शुरू करने के निर्देश दिए गए हैं. मंत्री ने जोर देकर कहा कि प्रकृति का संरक्षण सबकी साझा जिम्मेदारी है और जल, जंगल व जमीन को बचाना अनिवार्य है.

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विकास का वर्तमान मॉडल विनाशकारी: राजेंद्र सिंह

प्रसिद्ध पर्यावरणविद् और ‘जल पुरुष’ के नाम से विख्यात राजेंद्र सिंह ने वर्तमान विकास नीतियों पर तीखे सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि झारखंड में 60 फीसदी भूजल भंडार खाली हो चुके हैं और जलाशय सूख रहे हैं. जो कभी झारखंड बाढ़ और सुखाड़ से मुक्त था, अब इन आपदाओं का सामना कर रहा है. राजेंद्र सिंह ने आगाह किया कि जिस रास्ते पर देश चल रहा है, उससे आने वाले 5 वर्षों में अवैध विस्थापन तेजी से बढ़ेगा. आजादी के समय देश में बाढ़ और सुखाड़ की स्थिति नगण्य थी, लेकिन आज देश के सैकड़ों जिले इसकी चपेट में हैं.

सम्मेलन में अन्य वक्ताओं ने क्या कहा

सम्मेलन में रांची विश्वविद्यालय की कुलपति सरोज शर्मा और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. राजीव मनोहर ने भी अपने विचार साझा किए. कार्यक्रम की शुरुआत अबुआ अधिकार मंच के वेदांत कौस्तुभ के स्वागत भाषण से हुई. वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि प्रकृति और संस्कृति के बीच बढ़ती खाई को पाटना और सनातन विकास मॉडल को अपनाना आज की सबसे बड़ी जरूरत है.

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Published by: Sameer Oraon

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