Rajeshwari Modi Narayan Reiki, रांची (लता रानी की रिपोर्ट): समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने और हर व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक रूप से सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से समर्पित ‘नारायण रेकी सत्संग परिवार’ (NRSP) आज एक विशिष्ट पहचान बना चुका है. इस संस्था के माध्यम से संचालित होने वाली नारायण रेकी की विभिन्न गतिविधियों का मूल उद्देश्य हर व्यक्ति को स्वास्थ्य, सुख और समृद्धि से परिपूर्ण करना है. इस अभियान की जननी राजेश्वरी मोदी, जिन्हें अनुयायी स्नेहपूर्वक ‘राज दीदी’ कहकर पुकारते हैं, एक प्रतिष्ठित रेकी ग्रैंडमास्टर और एक्यूप्रेशर चिकित्सक होने के साथ-साथ एक कुशल मार्गदर्शक भी हैं. पिछले 33 वर्षों से निरंतर समाज सेवा में रत राज दीदी ने यह सिद्ध कर दिया है कि दृढ़ संकल्प और सेवा भावना से एक साधारण गृहिणी भी वैश्विक स्तर पर अमिट छाप छोड़ सकती है.
साधारण जीवन से असाधारण आध्यात्मिक यात्रा
मूल रूप से मुंबई की निवासी राज दीदी का प्रारंभिक जीवन परिवार और बच्चों की जिम्मेदारियों के इर्द-गिर्द एक सामान्य गृहिणी के रूप में बीता. इसी दौरान उनका परिचय रेकी विद्या से हुआ. दूर बैठकर भी ऊर्जा के माध्यम से दूसरों को सकारात्मकता भेजने की इस अद्भुत क्षमता ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। स्वयं पर इसके चमत्कारी परिणामों का अनुभव करने के बाद उन्होंने इस गूढ़ ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प लिया. उनके इसी उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें ब्रिटिश पार्लियामेंट सम्मान, लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड का ‘सर्टिफिकेट ऑफ एक्सीलेंस’ और ‘नारी रत्न’ जैसे अनेक राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से अलंकृत किया जा चुका है.
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जीवन की सार्थकता और झारखंड से जुड़ाव
राज दीदी का मानना है कि मानव जीवन अत्यंत दुर्लभ है, जिसे केवल भौतिक सफलता तक सीमित न रखकर सार्थक बनाना अनिवार्य है. वे निरंतर झारखंड और विशेषकर रांची का दौरा कर लोगों को जीवन जीने की कला सिखा रही हैं. रांची में उनकी सभाओं में उमड़ती भीड़ इस बात का प्रमाण है कि लोग अपने व्यस्त जीवन में संतुलन और शांति की तलाश में हैं. वे कहती हैं कि यदि मनुष्य अपने कर्तव्यों का निर्वहन पूरी ईमानदारी और सही दृष्टिकोण के साथ करे, तो वह अपने मनचाहे जीवन को सरलता से प्राप्त कर सकता है.
सफल जीवन के चार मूल सूत्र और ‘तप’ का महत्व
जीवन को सुगम बनाने के लिए राज दीदी चार स्तंभों पर जोर देती हैं- प्रेम (Love), सम्मान (Respect), विश्वास (Faith) और देखभाल (Care). उनके अनुसार, यदि हम अपने स्वभाव में दूसरों की नि:स्वार्थ देखभाल को शामिल कर लें, तो शेष तीन तत्व स्वतः ही जीवन का हिस्सा बन जाते हैं. इसके अतिरिक्त, वे ‘नारायण शास्त्र’ के माध्यम से जप और तप के अंतर को स्पष्ट करती हैं. वे समझाती हैं कि जप जहां चलते-फिरते भी संभव है, वहीं तप अधिक महत्वपूर्ण है. तप का वास्तविक अर्थ है कि अपने विचारों, वाणी और व्यवहार में निरंतर सकारात्मकता और अनुशासन बनाए रखना. राज दीदी के अनुसार, दूसरों द्वारा कराया गया जप फलदायी हो सकता है, परंतु अपना ‘तप’ स्वयं ही करना पड़ता है, जो जीवनपर्यंत और उसके पश्चात भी साथ रहता है.
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