खलारी. खलारी प्रखंड क्षेत्र में बढ़ते पार्थेनियम या गाजर घास से किसान ही नहीं, आम लोग भी परेशान हैं. प्रखंड क्षेत्र के हर इलाकों में पार्थेनियम घास साल-दर-साल बढ़ता ही जा रहा है. परंतु इन दिनों करकट्टा कॉलोनी में यह खरपतवार घास ज्यादा देखा जा रहा है. वहीं खेतों में इस घास के पनपने से फसलों को नुकसान हो रही है. इस घास को यदि कोई पशु खा लेता है, तो उसे बीमारी हो जाती है. इसके बावजूद जवाबदार लोग चुप्पी साधे हुए हैं. किसान किशुन मुंडा, छोटू मुंडा, कृष्ण कुमार महतो, रंजीत यादव सहित कई किसानों ने बताया कि यह एक शाकीय पौधा है जो हर तरह के वातावरण में तेजी से उग कर फसलों को नुकसान पहुंचा रहा है. किसान किशुन मुंडा एवं पंकज मुंडा ने बताया कि पार्थोनियम घास खेतों के साथ-साथ मनुष्य और पशुओं के लिए भी गंभीर समस्या है. ऐसे में इस विनाशकारी खरपतवार को समय रहते नियंत्रित करना बहुत आवश्यक है. कहा जाता है कि इस विषैले पौधे का बीज भारत के आजादी के बाद वर्ष 1950 में अमरीकी संकर गेहूं पीएल 480 के साथ भारत आया. अब संभवतः देश के हर हिस्से में पार्थेनियम घास ने अपनी मौजूदगी को स्थापित कर लिया है. जन-स्वास्थ्य पर भी इसका बुरा असर पड़ रहा है. पीएचसी खलारी के डॉ इरशाद ने बताया कि पार्थेनियम एक यूरोपियन घास है. इसे भारत में गाजर घास के नाम से जाना जाता है. यह काफी हानिकारक घास होता है. घास की अधिकता से लोगों में मनुष्यों में सांस की बीमारी हो सकती है, वहीं इस घास के संपर्क में आने से त्वचा संबंधी समस्याएं हो सकती है.
खेती से लेकर जनस्वास्थ्य के लिए हानिकारक गाजर घास की सफाई की नहीं है कोई योजना
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