गुणात्मक शिक्षा को बाबा कार्तिक उरांव ने बताया था सामाजिक बदलाव का हथियार, इंदिरा गांधी भी उनसे लेतीं थीं सलाह

लंदन के भारतीय एंबेसी में प्रवासी मुलाकात कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की इन पर नजर पड़ी. एक आदिवासी इंजीनियर की प्रतिभा ने पंडित नेहरू को अचंभित कर दिया. उन्होंने बाबा कार्तिक उरांव से कहा कि वे भारत लौटें और देश सेवा में जुटें.

कार्तिक बाबा का जन्म एक गरीब किसान परिवार में हुआ. उनके माता-पिता दोनों निरक्षर थे. बावजूद इसके, अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति की बदौलत उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में जो आयाम गढ़ा, आज भी बहुत कम पढ़े-लिखे परिवारों में देखने को मिलता है. सबसे पहले स्कूल में उनके गुरुओं ने उनकी प्रतिभा को पहचाना. शिक्षा के प्रति उनके लगाव और कुछ बड़ा कर गुजरने की लालसा को धार दिया. पटना साइंस कॉलेज से पढ़ाई करके वहीं के इंजीनियरिंग कॉलेज से सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री अच्छे अंकों से बाबा कार्तिक उरांव ने ली. कुछ दिन राज्य सरकार की नौकरी की. इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाने की उनकी इच्छा हुई. तमाम दुश्वारियों के बावजूद, समाज के प्रबुद्धजनों की आर्थिक मदद से वह इंग्लैंड पहुंच ही गए. ब्रिटिश रेल में काम करते हुए वहां के नामचीन कॉलेज एवं विश्वविद्यालय से सिविल स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग की डिग्रियां हासिल की. उन्होंने जिन शिक्षण संस्थानों में पढ़ाई की, उनमें ग्लासगो एवं अमेरिका के शिक्षण संस्थान भी शामिल थे. उनके साथ काम करने वाले विदेशी साथियों को बड़ी हैरानी होती थी कि मुश्किल से मुश्किल परीक्षा एक भारतीय कितनी आसानी से पास कर लेता है. उन्होंने कई ऐसी परीक्षाएं पास कीं, जिनमें पास होना अच्छे-अच्छों के लिए मुश्किल था. हिंकले प्वाइंट में बने इंग्लैंड के पहले न्यूक्लियर पावर स्टेशन का डिजाइन तैयार करने में बाबा की अहम भूमिका थी.

लंदन के भारतीय एंबेसी में प्रवासी मुलाकात कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की इन पर नजर पड़ी. एक आदिवासी इंजीनियर की प्रतिभा ने पंडित नेहरू को अचंभित कर दिया. उन्होंने बाबा कार्तिक उरांव से कहा कि वे भारत लौटें और देश सेवा में जुटें. प्रधानमंत्री के अनुरोध को बाबा कार्तिक उरांव ठुकरा न सके. कार्तिक उरांव जब स्वदेश लौटे, तो उन्हें रांची के हेवी इंजीनियरिंग कॉर्पोरेशन (एचइसी) डिप्टी चीफ इंजीनियर (डिजाइन) बनाया गया.

स्वदेश लौटने के बाद कार्तिक उरांव को नजदीक से गरीब आदिवासियों की दशा के बारे में देखने, जानने और समझने का अवसर मिला. आदिवासी समाज की दुर्दशा उनसे देखी नहीं गई. नौकरी छोड़कर लोहरदगा संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ गए. पहले चुनाव में असफलता मिलने के बावजूद वे आदिवासियों को एकजुट और जागृत करने में जुटे रहे. अगले चुनाव में जीतकर संसद पहुंचे. लोकसभा में उन्होंने अपनी विद्वता और संवेदनशीलता का परिचय दिया. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी उनकी प्रतिभा की कायल थीं. जरूरी मसलों पर बाबा से जरूर सलाह-मशविरा करतीं थीं. इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल में कार्तिक उरांव संचार मंत्री रहे.

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देश में आदिवासियों को एकजुट करके उनकी आवाज को बुलंद करने के लिए वर्ष 1967 में कार्तिक उरांव ने अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद की स्थापना की. बाबा ने आदिवासियों के हालात को समझते हुए उनकी व्यथा और समाधान को ‘बीस वर्ष की काली रात’ नामक पुस्तिका के माध्यम से देश के सामने प्रस्तुत किया. इसी के परिप्रेक्ष्य में समाज की बेहतरी एवं न्याय के लिए, संसद में एक प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया, जिसमें तथ्यों के आधार पर धर्मांतरित आदिवासियों द्वारा मूल आदिवासी धर्म में आस्था और विश्वास रखने वाले आदिवासियों पर अन्याय और उनके संवैधानिक अधिकारों का हनन करने का दोषी ठहराया. ऐसे लोगों को आरक्षण से बाहर रखने की उन्होंने वकालत की.

संसद में इस बिल को करीब 300 सांसदों ने इस बिल का समर्थन किया. इसके बावजूद कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने सुनियोजित तरीके से इस बिल को संसद में पास नहीं होने दिया. कार्तिक बाबा ने अपनी पहचान एक बेहद ईमानदार, काबलियत से भरपूर और दबे-कुचले आदिवासी समाज के लिए जीने और मरने वाले इंसान की साबित की. मैं समझता हूं कि हर योग्य राजनीतिज्ञ के अंदर ये गुण होने ही चाहिए और जनता को भी इसी पैमाने पर अपने प्रतिनिधियों को चुनना चाहिए. काश! हम सभी ऐसा कर पाते! बाबा ने गुणात्मक शिक्षा को सामाजिक बदलाव का हथियार बताया था. परिषद के माध्यम से इसी उद्देश्य से झारखंड के रांची, गुमला एवं लोहरदगा जिले में 126 रात्रि पाठशालाएं ग्रामीण युवक-युवतियों के द्वारा आदिवासी समाज के सजग प्रहरियों की देख-रेख में चलाया जा रहा है. पाठशाला के यही शिक्षक, छात्र-छात्राएं एवं उनके अभिभावक समाज, राज्य और देश को भविष्य में मजबूती के साथ आगे ले जाएंगे.

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बता दें कि बाबा कार्तिक उरांव ने एक सच्चे कर्मयोगी की तरह संसद में ही अपने प्राण त्यागे थे. आज (8 दिसंबर) को कार्तिक बाबा की पुण्यतिथि पर हम सभी उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और उनके बताए हुए रास्ते पर चलते हुए उनके सपनों को पूरा करने का संकल्प लेते हैं.

डॉ अरुण उरांव, लेखक पूर्व आईपीएस अधिकारी, भाजपा नेता हैं. कार्तिक उरांव के दामाद डॉ अरुण उरांव के दिशा-निर्देश में समाज को शिक्षित करने के लिए झारखंड के तीन जिलों में 126 रात्रि पाठशालाएं संचालित हो रहीं हैं.

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By Mithilesh Jha

मिथिलेश झा PrabhatKhabar.com में पश्चिम बंगाल राज्य प्रमुख (State Head) के रूप में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार हैं. उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 32 वर्षों से अधिक का व्यापक अनुभव है. उनकी रिपोर्टिंग राजनीति, सामाजिक मुद्दों, जलवायु परिवर्तन, नवीकरणीय ऊर्जा, कृषि और अन्य समसामयिक विषयों पर केंद्रित रही है, जिससे वे क्षेत्रीय पत्रकारिता में एक विश्वसनीय और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित हुए हैं. अनुभव : पश्चिम बंगाल, झारखंड और बिहार में 3 दशक से अधिक काम करने का अनुभव है. वर्तमान भूमिका : प्रभात खबर डिजिटल (prabhatkhabar.com) में पश्चिम बंगाल के स्टेट हेड की भूमिका में हैं. वे डिजिटल न्यूज कवर करते हैं. तथ्यात्मक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता को प्राथमिकता देते हैं. वर्तमान में बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 पर पूरी तरह से फोकस्ड हैं. भौगोलिक विशेषज्ञता : उनकी रिपोर्टिंग का मुख्य फोकस पश्चिम बंगाल रहा है, साथ ही उन्होंने झारखंड और छत्तीसगढ़ की भी लंबे समय तक ग्राउंड-लेवल रिपोर्टिंग की है, जो उनकी क्षेत्रीय समझ और अनुभव को दर्शाता है. मुख्य विशेषज्ञता (Core Beats) : उनकी पत्रकारिता निम्नलिखित महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्रों में गहरी विशेषज्ञता को दर्शाती है :- राज्य राजनीति और शासन : झारखंड और पश्चिम बंगाल की राज्य की राजनीति, सरकारी नीतियों, प्रशासनिक निर्णयों और राजनीतिक घटनाक्रमों पर निरंतर और विश्लेषणात्मक कवरेज. सामाजिक मुद्दे : आम जनता से जुड़े सामाजिक मुद्दों, जनकल्याण और जमीनी समस्याओं पर केंद्रित रिपोर्टिंग. जलवायु परिवर्तन और नवीकरणीय ऊर्जा : पर्यावरणीय चुनौतियों, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और रिन्यूएबल एनर्जी पहलों पर डेटा आधारित और फील्ड रिपोर्टिंग. डाटा स्टोरीज और ग्राउंड रिपोर्टिंग : डेटा आधारित खबरें और जमीनी रिपोर्टिंग उनकी पत्रकारिता की पहचान रही है. विश्वसनीयता का आधार (Credibility Signal) : तीन दशकों से अधिक की निरंतर रिपोर्टिंग, विशेष और दीर्घकालिक कवरेज का अनुभव तथा तथ्यपरक पत्रकारिता के प्रति प्रतिबद्धता ने मिथिलेश झा को पश्चिम बंगाल और पूर्वी भारत के लिए एक भरोसेमंद और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित किया है.

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