इनपुट- तन्वी झा
रांची: करम पर्व सिर्फ झारखंड की पहचान नहीं है बल्कि यह बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और असम के कई इलाकों में भी इसे अलग-अलग नाम और परंपराओं के साथ मनाया जाता है. इस त्योहार में बहनें भाई की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं. पूजा के बाद लोग करम डाल के चारों ओर रात भर नाचते-गाते हैं. भादो महीने की एकादशी आते ही आदिवासी इलाकों में इस पर्व की रौनक दिखाई देने लगती है. यह पर्व मुख्य रूप से अच्छी फसल, सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और परिवार की खुशहाली की कामना से जुड़ा है. कर्म देवता और कर्म पेड़ इस पर्व के केंद्र में होते हैं.
बिहार में करम: भाई की लंबी उम्र की कामना
बिहार के जमुई, बांका, गया, रोहतास जैसे कुछ ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में यह पर्व मनाया जाता हैं. इस पर्व की कुछ खास परंपराएं भी हैं. यहां कई जगहों पर युवतियां करम पर्व के दौरान फास्ट रखती हैं और वह कर्म देवता की पूजा कर अपने भाइयों की लंबी उम्र और परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं. पर्व से पहले जावा तैयार किया जाता है. इसके लिए सबसे पहले अलग-अलग अनाज के बीज को मिट्टी के साथ टोकरी में बोए जाते हैं. महिलाएं इसकी नियमित देखभाल करती हैं. करम पूजा के दिन जावा को पूजा में शामिल किया जाता है फिर शाम के समय कर्म डाल लाकर पूजा की जाती है. इसके बाद गीत-संगीत शुरू होता है.
ओडिशा में लोक- संस्कृति और करमा नृत्य की धूम
ओडिशा के पश्चिमी और उत्तरी जिलों जैसे सुंदरगढ़, मयूरभंज, क्योंझर और संबलपुर में करम पर्व बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है. यहां उरांव, गोंड, खड़िया और मुंडा समुदाय के लोग इसे अपनी संस्कृति का सबसे बड़ा हिस्सा मानते हैं. पूजा के दिन गांव के अखरा में कर्म के पेड़ की डाली गाड़ी जाती है और रात भर युवा मांदर और ढोल की थाप पर पारंपरिक करमा नृत्य करते हैं. ओडिशा में इस पर्व के दौरान पूरे गांव का माहौल रंग-बिरंगी पारंपरिक पोशाकों और गीतों से सराबोर हो जाता है.
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पश्चिम बंगाल में कैसे मनाया जाता है करम पर्व
पश्चिम बंगाल में पुरुलिया, झाड़ग्राम, बांकुड़ा और जंगल महल इलाकों में संथाल और कुड़मी (कुर्मी) समुदाय इसे बड़े उत्साह से मनाते हैं. यहां लोक नाटक और झूमर नृत्य सबसे खास बात है लोग करम देवता की कहानियों पर आधारित छोटे-छोटे नाटक करते हैं. झूमर नृत्य में पुरुष और महिलाएं साथ-साथ नाचते हैं. हालांकि समय के साथ इसे मनाने का तरीका बदला है. अब लोग इस मौके पर कई बड़े सामूहिक कार्यक्रम करते हैं, जहां हजारों लोग इकट्ठा होते हैं. खासकर तो इस अवसर पर पुरुलिया के मैदान में मेला जैसा माहौल बन जाता है. यहां नाच-गाने और मनोरंजन पर ज्यादा जोर रहता है. पूजा तो होती है, लेकिन उत्सव का रंग ज्यादा दिखता है.
छत्तीसगढ़ में खेती से करम पर्व
छत्तीसगढ़ के सरगुजा, जशपुर, रायगढ़ और बस्तर के क्षेत्रों में करम पर्व की एक अलग ही रौनक देखने को मिलती है. गोंड, बैगा और कंवर जनजातियों के लोग इस दिन को फसल की सुरक्षा और खुशहाली के रूप में मनाते हैं. करम की डाली को सजा-धज्जाकर गांव-गांव घुमाया जाता है. इसके बाद गोंड और बैगा समुदाय नाचते-गाते हुए लोक नाटक भी दिखाते हैं, जिनमें करम देवता की कहानियां होती हैं. जब लोग करम पर्व को सेलिब्रेट करते हैं तो ढोल-मांदर की आवाज दूर-दूर तक सुनाई देती है. यहां पारंपरिक शराब (महुआ या हंडिया) और ज्वार-बाजरा के व्यंजन ज्यादा चढ़ाए जाते हैं. यह उत्सव कभी-कभी दो-तीन दिनों तक चलता हैं. लोग इसे फसल की सुरक्षा और गांव की खुशहाली का बड़ा मौका मानते हैं.
मध्य प्रदेश में भी दिखता है करम का रंग
मध्य प्रदेश में शहडोल, मंडला, डिंडोरी, बालाघाट और सिवनी जिलों में गोंड, बैगा और कोरकू लोग इसे मनाते हैं. यहां पारंपरिक शराब और मिलेट (ज्वार-बाजरा) के व्यंजन खास तौर पर चढ़ाए जाते हैं. यह उत्सव कई दिनों तक चलता है. पूजा के बाद कहानियां सुनाई जाते हैं. इसके बाद लोग एक साथ मिलकर लोक गीत गाते हैं और नाचते हैं. बैगा समुदाय में प्रकृति से जुड़ी बातें ज्यादा होती हैं. यहां पूजा के साथ-साथ खाने-पीने और इकट्ठा होने पर भी काफी जोर रहता है. एमपी में यह पर्व खेती, प्रकृति और परिवार की खुशहाली से जुड़ा है. इस दौरान करम पेड़ की डाल को पूजा स्थल पर स्थापित कर करम देवता की पूजा की जाती है लोग अच्छी फसल और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं.
असम में करम पर्व की अपनी पहचान
असम में भी करम पर्व की अनोखी परंपरा देखने को मिलती है. खासकर चाय बागानों में रहने वाले आदिवासी समुदाय (उरांव, मुंडा, संथाल व अन्य) लोग इसे मनाते हैं. पर्व के दौरान करम डाल को पूजा स्थल पर स्थापित किया जाता है. लोग करम देवता की पूजा कर अच्छी फसल, परिवार की खुशहाली और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं. इसके बाद शुरू होता है गीत और नृत्य का दौर इसकी सबसे बड़ी खासियत झूमर डांस है. महिलाएं भी इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं. इस दौरान पूरा चाय बागान क्षेत्र लोकगीतों और पारंपरिक नृत्य से झूम उठता है. ये लोग झारखंड-ओडिशा से आकर यहा बसे हैं. इसलिए उनकी परंपराएं भी मिलती-जुलती हैं. कुछ सालों से असम सरकार ने करम पर्व पर छुट्टी भी घोषित की है जिससे उत्सव और भव्य हो गया है.
करम की क्या है सबसे बड़ी पहचान
करम पर्व की खासियत यह है कि इसमें पूरा समुदाय शामिल होता है. बच्चे, युवा, महिलाएं और बुजुर्ग सभी अपनी भूमिका निभाते हैं. करम डाल गांव के अखड़ा या सामुदायिक स्थान पर लाई जाती है. पूजा के बाद लोग देर रात तक गीत गाते और नाचते हैं. आज के समय में जब गांवों की पुरानी परंपराएं धीरे-धीरे बदल रही हैं, करम पर्व लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम कर रहा है. झारखंड से लेकर बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और असम तक करम का रूप भले ही थोड़ा अलग हो, लेकिन इसका संदेश एक ही है- प्रकृति का सम्मान, अच्छी फसल की उम्मीद, रिश्तों की मजबूती और समाज की एकजुटता.
