पंकज त्रिपाठी की रिपोर्ट
रांचीः झारखंड के मेधावी छात्रों की जगह कथित रूप से गड़बड़ी कर बीडीओ, सीओ, डीएसपी, वाणिज्यकर अधिकारी जैसे ऊंचे ओहदों पर बैठे अधिकारियों की सारी कारगुजारियों का ब्यौरा सीबीआइ ने डेढ़ साल पहले कोर्ट को सौंप दिया है. इसके साथ ही अपनी जांच भी जारी रखी है. सीबीआइ ने दूसरी संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा घोटाले के संबंध में कोर्ट को प्रमाण के साथ यह बताया है कि जेपीएससी में रसूखदारों ने किस तरह की गड़बड़ियां की. कैसे अपने सगे-संबंधियों को ऊंचे ओहदों पर भर्तियां करा दी.
जांच के दौरान जो संदिग्ध कॉपियां मिली उसकी गड़बड़ी को न केवल खुद से जांचा बल्कि नंबर में हेरफेर, काट-छांट, दोबारा अंक दिए जाने जैसे मामलों की पुष्टि के लिए उन सभी कॉपियों की फॉरेंसिक जांच कराई. यह जांच गुजरात के गांधीनगर स्थित फॉरेंसिक लैब में कराई गई. लैब ने गड़बड़ियों की पुष्टि की. सीबीआइ ने नौ बिंदुओं पर जांच कर 60 आरोपियों पर आपराधिक षड्यंत्र, धोखाधड़ी, कूटरचना व भ्रष्टाचार का मुकदमा चलाने की सिफारिश की है.
सीबीआइ ने परीक्षा में पाई ये गड़बड़ियां
नंबरों में हेराफेरी की फॉरेंसिक जांच में हुई है पुष्टि: गांधीनगर (गुजरात) स्थित फॉरेंसिक साइंस निदेशालय ने कई कॉपियों में अंकों के परिवर्तन की वैज्ञानिक पुष्टि की है. यानी सीबीआइ ने केवल दस्तावेजी जांच के बजाय फॉरेंसिक साक्ष्य एकत्रित कर कोर्ट को दिया है. सीबीआइ ने जिस कॉपी को संदिग्ध पाया, उसके हर पन्ने की जांच लैब से कराई.
ओएमआर शीट में सीधा फर्जीवाड़ा: कई अभ्यर्थियों ने ओएमआर शीट में बहुत कम गोले भरे थे (कुछ ने तो सिर्फ 7-25 गोले), लेकिन मार्कशीट में ऐसे अभ्यर्थियों को भी उनके गोलों की तुलना में कई गुना अधिक अंक दिए गए. यानी वास्तविक ओएमआर शीट और आधिकारिक अंक तालिका में सीधा विरोधाभास मिला, जो गड़बड़ी का ठोस साक्ष्य है.
उत्तर पुस्तिकाओं में भौतिक काट-छांट: सीबीआइ ने जांच में पाया कि मुख्य परीक्षा की सैकड़ों कॉपियों में अंकों को काटकर /मिटाकर बढ़ाया गया है. कॉपियों और मार्कशीट को देखने पर यह अंतर साफ दिखता है. जांच में यह तथ्य सामने आया कि एक दो कॉपियों में काट-छांट हो सकती है पर सैकड़ों की संख्या में ऐसा होना साजिश लगता है.
पुनर्मूल्यांकन में 80 फीसदी तक अंतर दिखा: सीबीआइ ने अभ्यर्थियों की कॉपी देखने के बाद इसका पुनर्मूल्यांकन कराया. यह काम वर्ष 2019 में हुआ. इसके लिए बीपीएससी विशेषज्ञों को बुलाया गया था. सीसीटीवी निगरानी में जांच हुई. कई कॉपियों में असली अंक और जेपीएससी द्वारा दिए गए अंक में 30 से 80 फीसदी तक का अंतर मिला.
मूल्यांकनकर्ताओं की स्वीकारोक्ति: जांच केबाद सीबीआइ ने मूल्यांकन कर्ताओं से पूछताछ की. इस दौरान आठ से अधिक मूल्यांकनकर्ताओं ने माना कि उन्होंने गलती की. मजिस्ट्रेट के सामने बयान देकर खुद स्वीकार किया कि उन्होंने दबाव में या कुछ लोगों के निर्देश पर अभ्यर्थियों के अंक बढ़ाए.
रिश्तेदारों को सीधा लाभ: जांच में यह साबितहुआ कि जिन अभ्यर्थियों के अंक सबसे ज्यादा बढ़े, वे जेपीएससी अध्यक्ष/सदस्य के बेटे, भाई, भतीजे या भांजे निकले. यानी हितों के टकराव का प्रत्यक्ष प्रमाण मिला. यह संजोग नहीं हो सकता कि जिन अभ्यर्थियों के अंकों में सबसे अधिक अंतर दिखा वह सभी किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति के रिश्तेदार थे.
पूरी परीक्षा प्रक्रिया नियम विरुद्ध हुई: पूरी परीक्षा प्रक्रिया (स्कैनिंग, कोडिंग-डिकोडिंग, रिजल्ट तैयार करना) नियम विरुद्ध एक निजी व्यक्ति को सौंपी गई थी. यही व्यक्ति परीक्षा के सारे काम कर रहा था, महत्वपूर्ण निर्णय ले रहा था. इसकी नियुक्ति की कोई अधिकृत आदेश फाइलों में नहीं मिली. एक पत्र मिला जो बैकडेटेड पाया गया.
रिकॉर्ड की जानबूझकर गुमशुदगी: प्रश्नपत्र, उत्तर कुंजी और प्रोसेसिंग फाइलें जेपीएससी सीबीआइ को नहीं दे सका. जांच ने इसे साक्ष्य नष्ट करने की सुनियोजित कोशिश माना.
निर्धारित संख्या से कहीं अधिक चयन: प्रारंभिक परीक्षा में 1,720 की जगह 16,314 और मुख्य परीक्षा में 516 की जगह 804 अभ्यर्थी पास किए गयए, जो नियमों के उल्लंघन का प्रमाण है.
