झारखंड में सरकार के आदेश को अधिकारियों ने दिखाया ठेंगा, बिना मरम्मत मानसून की भेंट चढ़ेंगे दर्जनों ग्रामीण पुल

Jharkhand Rural Bridge Update: झारखंड में ग्रामीण कार्य विभाग के निर्देश के बावजूद किसी भी प्रमंडल से ग्रामीण पुलों की मरम्मत का प्रस्ताव नहीं मिला है. इस वजह से बरसात में पुलों के ढहने का खतरा बढ़ गया है.

रांची से मनोज लाल की रिपोर्ट

Jharkhand Rural Bridge Update, रांची : झारखंड में बरसात का मौसम शुरू हो चुका है, लेकिन राज्य के ग्रामीण इलाकों में आवागमन की लाइफलाइन माने जाने वाले पुल-पुलियों को लेकर एक बेहद डरावनी और प्रशासनिक लापरवाही की खबर सामने आई है. ग्रामीण कार्य विभाग की तमाम कड़ाई और एडवांस निर्देशों के बावजूद, राज्य के किसी भी विशेष प्रमंडल (Division) से कमजोर और जर्जर पुलों की रिपेयरिंग (मरम्मत) का कोई प्रस्ताव मुख्यालय को नहीं भेजा गया. नतीजा यह है कि अब समय पूरी तरह निकल चुका है और तेज बारिश के बीच इन पुलों का सुदृढ़ीकरण तकनीकी रूप से संभव नहीं होगा. ऐसे में भारी बारिश और नदियों के उफान के कारण ग्रामीण क्षेत्रों के दर्जनों कमजोर पुल-पुलियों के क्षतिग्रस्त होने और ढहने की संभावना काफी बढ़ गई है.

विभाग ने पहले ही किया था सचेत

विभागीय सूत्रों के अनुसार, ग्रामीण कार्य विभाग ने मानसून के मद्देनजर पहले ही राज्य के सभी विशेष प्रमंडलों को एक गाइडलाइन जारी कर कड़े निर्देश दिए थे. निर्देश में साफ कहा गया था कि प्रमंडल अपने-अपने क्षेत्रों में ऐसे ग्रामीण पुल-पुलियों को चिह्नित करें जो जर्जर हैं और जिन्हें तुरंत मरम्मत की जरूरत है, ताकि उनका प्रस्ताव भेजकर बरसात से पहले दुरुस्त किया जा सके. इसके तहत बने वैसे पुल, जिनका ‘डिफेक्ट लायबिलिटी पीरियड’ (निर्माण कंपनी की गारंटी अवधि) समाप्त हो चुका है और उन्हें रिपेयर की दरकार है. उन पर तत्काल एक्शन लिया जाए. हैरानी की बात यह है कि मुख्यालय के इस महत्वपूर्ण और संवेदनशील आदेश को प्रमंडलों के इंजीनियर डस्टबिन में डाल कर बैठ गए. न तो कहीं से कोई ग्राउंड रिपोर्ट आई और न ही किसी पुल को बचाने के लिए फंड का प्रस्ताव दिया गया.

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हर साल ताश के पत्तों की तरह ढहते हैं पुल

झारखंड के ग्रामीण इलाकों में यह कहानी हर साल दोहराई जाती है. तेज बारिश और बाढ़ के पानी के दबाव के कारण पुलिया और संपर्क पथ बह जाते हैं, जिससे दर्जनों गांवों का जिला मुख्यालयों से संपर्क पूरी तरह कट जाता है. पुलों के समय पर मेंटेनेंस न होने के अलावा नदियों से होने वाला अंधाधुंध बालू उठाव (Illegal Sand Mining) भी इसके लिए जिम्मेदार है, जिससे पुलों का बेस (नींव) खोखला और कमजोर हो जाता है. विभाग की मंशा इस बार इन हादसों को पहले ही रोकने की थी, ताकि जनता को परेशानी न हो. लेकिन निचले स्तर के अधिकारियों की शिथिलता और लापरवाही ने सरकार की इस योजना पर पानी फेर दिया है. अब अगर इस बरसात में कोई बड़ा पुल टूटता है या कोई बड़ा हादसा होता है, तो इसकी सीधी जिम्मेदारी संबंधित प्रमंडल के लापरवाह अधिकारियों की होगी.

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Published by: Sameer Oraon

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