रांची से अभिषेक आनंद की रिपोर्ट
Jharkhand IAS Posting: अगर कोई कहे कि जेल से निकलने के कुछ महीनों बाद फिर से सरकार में अहम पद मिल सकता है, तो आम आदमी को यह मजाक लग सकता है. लेकिन झारखंड की नौकरशाही में पिछले कुछ वर्षों की तीन चर्चित कहानियां इसी सवाल को चर्चा के केंद्र में ले आई हैं. पूजा सिंघल, छवि रंजन और विनय कुमार चौबे. तीनों IAS अधिकारी, तीनों पर करोड़ों रुपये के भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े गंभीर आरोप लगे, तीनों ने लंबा समय जेल में बिताया और फिर अदालत से जमानत मिलने के बाद सरकारी सेवा में लौट आए. हालांकि, तीनों मामलों में आरोप अभी अदालत में विचाराधीन हैं और किसी भी अधिकारी को दोषी घोषित नहीं किया गया है.
पूजा सिंघल: 20 करोड़ की बरामदगी से जेल तक
2000 बैच की IAS अधिकारी पूजा सिंघल सबसे पहले मई 2022 में सुर्खियों में आईं, जब प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने उन्हें मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गिरफ्तार किया. खूंटी की पूर्व उपायुक्त रहीं पूजा सिंघल पर मनरेगा फंड में अनियमितताओं और बाद में अवैध खनन से जुड़े मामलों में जांच हुई. ईडी की छापेमारी के दौरान उनके पति के चार्टर्ड अकाउंटेंट के घर से करीब 20 करोड़ रुपये नकद बरामद हुए थे. बाद की कार्रवाई में अवैध खनन से जुड़े मामलों में कुल 36 करोड़ रुपये से अधिक नकदी जब्त होने की बात सामने आई. गिरफ्तारी के अगले दिन राज्य सरकार ने उन्हें निलंबित कर दिया.
28 महीने में पूजा सिंघल को मिली थी बेल
सुप्रीम कोर्ट ने शुरुआती दौर में उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी. करीब 28 महीने जेल में रहने के बाद दिसंबर 2024 में पूजा सिंघल विशेष अदालत से जमानत मिली. इसके बाद उनका निलंबन समाप्त हुआ और फरवरी 2025 में उन्हें सूचना प्रौद्योगिकी एवं ई-गवर्नेंस विभाग की सचिव के साथ झारखंड कम्युनिकेशन नेटवर्क लिमिटेड की जिम्मेदारी भी सौंप दी गई.
छवि रंजन: जमीन घोटाले से खेल प्राधिकरण तक
2011 बैच के IAS अधिकारी और रांची के पूर्व उपायुक्त छवि रंजन पर सरकारी और सेना की जमीन के कथित फर्जी हस्तांतरण में भूमिका निभाने का आरोप लगा. मामला रांची की करीब एक एकड़ सरकारी जमीन और बारियातू इलाके की लगभग साढ़े चार एकड़ सेना की जमीन से जुड़ा था, जिसमें 74 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति कुर्क की गई. ईडी ने मई 2023 में लगभग दस घंटे की पूछताछ के बाद उन्हें गिरफ्तार किया. दो साल से अधिक जेल में रहने और निचली अदालतों से लगातार राहत नहीं मिलने के बाद अक्टूबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें शर्तों के साथ जमानत दी.
रिहाई के साथ ही छवि रंजन का निलंबन समाप्त
रिहाई के दिन ही छवि रंजन का निलंबन भी समाप्त कर दिया गया. पहले उन्हें राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन का अभियान निदेशक बनाया गया, बाद में आदेश बदलकर स्वास्थ्य विभाग में संयुक्त सचिव नियुक्त किया गया. मई 2026 से वे झारखंड खेल प्राधिकरण के कार्यकारी निदेशक के रूप में कार्यभार संभाल चुके हैं.
विनय कुमार चौबे: दो मामलों में गिरफ्तारी, SC से राहत
1999 बैच के IAS अधिकारी विनय कुमार चौबे मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके हैं. उनके खिलाफ पहला मामला कथित शराब नीति घोटाले से जुड़ा था, जिसमें सरकारी खजाने को लगभग 38 करोड़ रुपये का नुकसान होने का आरोप लगा. मई 2025 में एंटी करप्शन ब्यूरो ने उन्हें गिरफ्तार किया, लेकिन समय पर चार्जशीट दाखिल नहीं होने के कारण अगस्त 2025 में उन्हें डिफॉल्ट जमानत मिल गई. हालांकि तब तक हजारीबाग में करीब 5000 एकड़ सरकारी और वन भूमि के कथित अवैध हस्तांतरण का दूसरा मामला उनके खिलाफ दर्ज हो चुका था.
विनय चौबे को 13 महीने की जेल के बाद जमानत
जनवरी 2026 में हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद 31 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने करीब 13 महीने की हिरासत के बाद उन्हें जमानत दे दी. इसके बाद उनका निलंबन भी समाप्त कर दिया गया और उन्होंने कार्मिक, प्रशासनिक सुधार एवं राजभाषा विभाग में योगदान दे दिया. फिलहाल वे नियमित विभागीय जिम्मेदारी के लिए नई पोस्टिंग का इंतजार कर रहे हैं.
तीनों मामलों में दिखता है एक जैसा पैटर्न
इन तीनों मामलों में एक समान क्रम दिखाई देता है. पहले गिरफ्तारी हुई, फिर लंबी न्यायिक हिरासत, उसके बाद निचली अदालतों से राहत नहीं मिली और अंततः ऊपरी अदालत से जमानत मिली. जमानत के बाद निलंबन समाप्त हुआ और तीनों अधिकारियों की सरकारी सेवा में वापसी हो गई. किसी को सचिव बनाया गया, किसी को विभाग का निदेशक और कोई नई जिम्मेदारी की प्रतीक्षा में है.
इसे भी पढ़ें: DSPMU में स्मार्ट इंडिया हैकथॉन 2026, कुलपति बोले - जल्द बनेगी आइडिया लैब
क्या आम आदमी को भी मिलता ऐसा अवसर?
यहीं से बहस शुरू होती है. झारखंड में इन मामलों को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के बावजूद प्रशासनिक व्यवस्था में वापसी इतनी सहज क्यों दिखाई देती है. दूसरी ओर कानूनी पक्ष यह है कि भारतीय कानून के तहत जमानत दोषमुक्ति नहीं होती और जब तक अदालत किसी व्यक्ति को दोषी करार नहीं देती, तब तक वह निर्दोष माना जाता है.
इसे भी पढ़ें: BRICS अकादमिक फोरम में गूंजी पलामू की आवाज, डॉ सीमी मेहता ने उठाया संयुक्त राष्ट्र में सुधार का मुद्दा