रांची से सतीश सिंह की रिपोर्ट
Jharkhand High Court: झारखंड में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां एक सेवानिवृत्त कर्मचारी के सरकारी आवास का किराया महज छह महीने के भीतर एक लाख रुपये से बढ़कर 16 लाख रुपये कर दिया गया. इस पर झारखंड हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है और पूरे मामले के पुनर्मूल्यांकन का निर्देश दिया है. अदालत ने इसे गंभीर अनियमितता मानते हुए संबंधित अधिकारियों से जवाब तलब किया है.
सीएसआईआर निदेशक से मांगा जवाब
मामले की सुनवाई जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद की अध्यक्षता वाली खंडपीठ में हुई. कोर्ट ने सीएसआईआर (सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ माइनिंग एंड फ्यूल रिसर्च) के निदेशक से सवाल किया कि आखिर इतनी कम अवधि में हाउस रेंट में इतनी बड़ी बढ़ोतरी कैसे हो गई. अदालत ने निदेशक को निर्देश दिया कि सेवानिवृत्त कर्मी गोपाल चंद्र लोहार के 16 लाख रुपये के किराया बिल का पुनर्मूल्यांकन कर नई गणना प्रस्तुत की जाए. अगली सुनवाई 1 मई को निर्धारित की गई है. हालांकि, कोर्ट ने निदेशक को व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट दे दी है, लेकिन सेक्शन अफसर और प्रशासनिक अधिकारी को अगली सुनवाई में उपस्थित रहने का आदेश दिया है.
क्या है पूरा मामला
याचिकाकर्ता गोपाल चंद्र लोहार वर्ष 1989 में सीएसआईआर धनबाद में टेक्नीशियन के पद पर नियुक्त हुए थे और 31 दिसंबर 2021 को सेवानिवृत्त हुए. आरोप है कि सेवानिवृत्ति के बाद करीब आठ महीने तक उन्हें उनके लाभों का भुगतान नहीं किया गया.संस्थान ने उन्हें पत्र देकर बताया था कि सेवानिवृत्ति के बाद आवास का किराया 9,995 रुपये प्रतिमाह देना होगा. इसके बाद 17 अप्रैल 2023 को उन्हें कुल बकाया किराया 1,06,403 रुपये बताया गया. इसी आधार पर उन्होंने नवंबर 2023 में आवास खाली कर दिया.
अचानक बढ़ा 16 लाख का बिल
मामला तब विवादित हो गया, जब संस्थान ने बाद में किराया बकाया बढ़ाकर 16,11,163 रुपये कर दिया. इतनी बड़ी वृद्धि ने कई सवाल खड़े कर दिए. याचिकाकर्ता का आरोप है कि यह राशि उनकी ग्रेच्युटी और लीव एनकैशमेंट से काटने की मंशा से बढ़ाई गई है, जो करीब 23 लाख रुपये बनती है. उन्होंने इसे अनुचित और मनमाना बताते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया.
ट्रिब्यूनल के फैसले पर भी उठे सवाल
गोपाल चंद्र लोहार ने सरकारी क्वार्टर के किराया और दंडात्मक शुल्क की गणना को चुनौती देते हुए पहले ट्रिब्यूनल का रुख किया था. लेकिन ट्रिब्यूनल ने बिना विस्तृत कारण बताए उनकी याचिका खारिज कर दी. हाईकोर्ट ने इस पर भी सवाल उठाया और कहा कि ट्रिब्यूनल का आदेश बेहद संक्षिप्त और अपर्याप्त है. अदालत ने टिप्पणी की कि बिना उचित जवाब मांगे ही मामले का निपटारा करना न्यायोचित नहीं लगता.
गणना में भारी अंतर पर कोर्ट सख्त
अदालत ने अपने पूर्व आदेश में स्पष्ट किया था कि 17 अप्रैल 2023 को जहां बकाया 1,06,403 रुपये बताया गया था, वहीं 22 अप्रैल 2024 को यह बढ़कर 16,11,163 रुपये कैसे हो गया, इसका कोई स्पष्ट आधार नहीं दिया गया. कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि पहली गणना प्रशासनिक अधिकारी द्वारा की गई थी, जबकि बाद की गणना एक निम्न स्तर के सेक्शन अफसर ने की, जो प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है.
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पुनर्मूल्यांकन से मिल सकती है राहत
अब हाईकोर्ट के निर्देश के बाद इस पूरे मामले का पुनर्मूल्यांकन किया जाएगा. इससे यह तय होगा कि वास्तविक किराया कितना बनता है और क्या वाकई इतनी बड़ी राशि वसूलना उचित है या नहीं.
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