जयराम महतो-थानेदार विवाद में कूदे बाबूलाल मरांडी, कहा- 'क्या मर्यादा का नियम सिर्फ जनप्रतिनिधियों के लिए है'?

बाबूलाल मरांडी बोकारो के चास थानेदार और विधायक जयराम महतो के बीच हुए विवाद में कूद पड़े हैं. उन्होंने पुलिस एसोसिएशन की भूमिका और वर्दी के दुरुपयोग पर गंभीर सवाल उठाए हैं.

बोकारो : बोकारो के बरवाअड्डा थानेदार और विधायक जयराम महतो के बीच हुई तीखी नोकझोंक के बाद उठे राजनीतिक तूफान में अब बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी भी कूद पड़े हैं. इस मामले में पुलिस एसोसिएशन द्वारा दिए जा रहे बयानों पर ऐतराज जताते हुए बाबूलाल मरांडी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' (X) पर पोस्ट कर राज्य सरकार और पुलिस महकमे पर कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं. उन्होंने दो टूक कहा कि शिष्टाचार और मर्यादा का नियम क्या केवल जनप्रतिनिधियों के लिए ही लागू होता है?

पुलिस एसोसिएशन और खाकी की मंशा पर सवाल

बाबूलाल मरांडी ने पुलिस एसोसिएशन की भूमिका पर सवाल उठाते हुए पूछा कि क्या एसोसिएशन ने कभी अभद्र भाषा बोलने वाले दरोगा के खिलाफ कोई कार्रवाई की है या कभी इस व्यवहार की निंदा की है? उन्होंने कहा कि आम जनता के साथ गाली-गलौज से बात न करने की हिदायत कभी किसी पुलिसकर्मी को नहीं दी जाती. इसके अलावा, उन्होंने बिना सहमति के बातचीत रिकॉर्ड कर उसे सोशल मीडिया पर वायरल करने को निजता का हनन और आपराधिक कृत्य करार देते हुए पूछा कि क्या यह कानून केवल आम लोगों के लिए है, पुलिस के लिए नहीं?

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गालीबाज अफसरों को संरक्षण देने का आरोप

झारखंड के नेता प्रतिपक्ष ने बोकारो के चास थाना प्रभारी का उदाहरण देते हुए याद दिलाया कि कुछ महीने पहले भी उनका एक कथित विवादित ऑडियो वायरल हुआ था. उस समय भी एफआईआर दर्ज कर कार्रवाई की मांग की गई थी, लेकिन सरकार ने कार्रवाई करने के बजाय ऐसे अफसरों को संरक्षण देने का काम किया. उन्होंने आरोप लगाया कि थानों में आम जनता से बदसलूकी, फोन पर गाली-गलौज और दुर्व्यवहार की शिकायतें लगातार सामने आती हैं. आज अगर पुलिस और जनप्रतिनिधियों के बीच ऐसी स्थिति बन रही है, तो इसके लिए राज्य सरकार की नीतियां और उसका संरक्षण पूरी तरह से जिम्मेदार है.

'क्या पुलिस को गाली देने का विशेष अधिकार मिला है?'

बाबूलाल मरांडी ने सवाल करते हुए कहा कि अगर आम जनता द्वारा गाली देना अपराध है, तो फिर पुलिस को जनता को अपमानित करने का कौन-सा विशेष विशेषाधिकार (Special Privilege) मिला हुआ है और यह अधिकार किसने दिया है? उन्होंने मांग की कि पुलिस को सबसे पहले जनता से बात करने का तरीका और शिष्टाचार सीखना होगा. सरकार को चाहिए कि ऐसे मामलों में केवल निलंबन की लीपापोती करने के बजाय सख्त कार्रवाई करे और दोषी पुलिसकर्मियों पर प्राथमिकी (FIR) दर्ज करे, तभी व्यवस्था में असली सुधार आ पाएगा.'

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लेखक के बारे में

By समीर उरांव

इंटरनेशनल स्कूल ऑफ बिजनेस एंड मीडिया से बीबीए मीडिया में ग्रेजुएट होने के बाद साल 2019 में भारतीय जनसंचार संस्थान दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा किया. 5 साल से अधिक समय से प्रभात खबर में डिजिटल पत्रकार के रूप में कार्यरत हूं. इससे पहले डेली हंट में बतौर प्रूफ रीडर एसोसिएट के रूप में काम किया. झारखंड के सभी समसामयिक मुद्दे खासकर राजनीति, लाइफ स्टाइल, हेल्थ से जुड़े विषयों पर लिखने और पढ़ने में गहरी रुचि है. तीन साल से अधिक समय से झारखंड डेस्क पर काम कर रहा हूं. फिर लंबे समय तक लाइफ स्टाइल के क्षेत्र में भी काम किया हूं. इसके अलावा स्पोर्ट्स में भी गहरी रुचि है.

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