Ranchi News : गुरुओं की समर्पित शिक्षण शैली ही विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास का आधार

हर साल आषाढ़ पूर्णिमा पर गुरु पूर्णिमा पर्व मनाया जाता है.

(गुरु पूर्णिमा पर विशेष)

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः, गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः।अर्थात गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं और गुरु ही भगवान शंकर हैं. गुरु ही साक्षात परब्रह्म हैं. ऐसे गुरु को मैं प्रणाम करता हूं. हर साल आषाढ़ पूर्णिमा पर गुरु पूर्णिमा पर्व मनाया जाता है. देवशयनी एकादशी के बाद गुरु पूर्णिमा का पर्व आता है यानी देव शयन के बाद गुरु ही हमें परेशानियों से बचाते हैं. इस पर्व को व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं. इस दिन को चारों वेदों के रचयिता और महाभारत जैसे महाकाव्य की रचना करने वाले वेद व्यास का जन्म हुआ था. वेद व्यास की जयंती पर ही गुरु पूर्णिमा मनायी जाती है. यह पर्व अपने आराध्य गुरु को श्रद्धा अर्पित करने का महापर्व है. शास्त्रों में गुरु का स्थान भगवान से भी ऊंचा बताया है. गुरु ही हमें सही-गलत का भेद बताते हैं, गुरु ही भगवान को पाने का रास्ते बताते हैं, इसलिए गुरु का हर स्थिति में सम्मान करना हमारा धर्म है.

कुछ समय पूर्व गुरुओं की भूमिका शिक्षा जगत में अत्यंत महत्त्वपूर्ण और प्रभावशाली मानी जाती थी. वे केवल ज्ञान-वितरण तक सीमित नहीं रहते थे, बल्कि विद्यार्थियों के जीवन-निर्माता और नैतिक मार्गदर्शक की भूमिका भी निभाते थे. उस समय शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा उत्तीर्ण करना या नौकरी प्राप्त करना नहीं था, बल्कि छात्रों को एक सुसंस्कृत, चरित्रवान और उत्तरदायी नागरिक बनाना था. गुरुजन अपने आचरण और व्यवहार से विद्यार्थियों को समयनिष्ठा, परिश्रम, शिष्टाचार और सह-अस्तित्व जैसे जीवन-मूल्यों की शिक्षा देते थे. वृक्षारोपण, वर्षा जल संचयन, पशु-पक्षियों के प्रति करुणा व खुले वातावरण में अध्ययन जैसी गतिविधियां शिक्षा के अनिवार्य अंग थीं, जो पर्यावरण चेतना को जाग्रत करती थीं. इस प्रकार, उस समय की शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं थी, बल्कि व्यक्तित्व विकास, नैतिकता और चरित्र निर्माण को उसका मूल आधार माना जाता था. गुरुओं की यही समर्पित शिक्षण शैली विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास का आधार बनती है. आज शिक्षक का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. लेकिन, तकनीकी प्रगति और सूचना-स्रोतों की विविधता ने शिक्षण के स्वरूप को परिवर्तित किया है. अब शिक्षक केवल पाठ्य-पुस्तकों तक सीमित नहीं, बल्कि एक फेसिलिटेटर की भूमिका में हैं. आज की भाग-दौड़ और परिणाम-केंद्रित शिक्षा में गुरु-शिष्य संबंधों की आत्मीयता और नैतिक गहराई कुछ सीमा तक क्षीण हुई है. इसलिए आवश्यक है कि वर्तमान शिक्षा में मानवीय मूल्यों, संवाद और परस्पर सम्मान को पुनः स्थान दिया जाये.

डॉ धनंजय वासुदेव द्विवेदी, संस्कृत विभागाध्यक्ष, डीएसपीएमयू

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