Ranchi: रांची विश्वविद्यालय के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग की पूर्व विभागाध्यक्ष, साहित्यकार, शिक्षाविद एवं प्रख्यात आलोचक डॉ कुमारी बासंती का रविवार को निधन हो गया. डॉ बासंती का अंतिम संस्कार उनके पैतृक गांव सिमडेगा के रेगाडीह स्थित पोढा़टोली गांव में आज हो गया. उनके निधन से नागपुरी भाषा और साहित्य जगत के एक युग का अवसान हो गया. नागपुरी भाषा साहित्य से जुड़े लोग डॉ बासंती के निधन से मर्माहत हैं और उन्होंने शोक व्यक्त किया है.
नागपुरी भाषा के प्रति था समर्पण
नागपुरी संकाय के सहायक प्राध्यापक डॉ बीरेंद्र कुमार महतो ने कहा कि उनके निधन से हुई क्षति अपूर्णीय है. डॉ बासंती का जीवन नागपुरी भाषा के प्रति समर्पण, साधना और सृजन का अद्वितीय उदाहरण रहा. बीरेंद्र महतो ने कहा कि वे केवल एक अध्यापिका नहीं थीं, बल्कि एक ऐसी मार्गदर्शक शक्ति थीं, जिन्होंने नागपुरी भाषा को अकादमिक गरिमा दिलाने के साथ-साथ उसके साहित्यिक विस्तार को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया.
जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग में उनका योगदान महत्वपूर्ण
डॉ महतो ने आगे कहा कि रांची विश्वविद्यालय के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा, जहां उन्होंने वर्षों तक विद्यार्थियों और शोधार्थियों को दिशा प्रदान की. उनके शिष्य उन्हें आदरपूर्वक ‘दीदी’ कहकर संबोधित करते थे, जो उनके स्नेह, अनुशासन और बौद्धिक नेतृत्व का सजीव प्रतीक है. नागपुरी साहित्य के क्षेत्र में उनका योगदान बहुआयामी और अत्यंत समृद्ध रहा.
उन्होंने नागपुरी गीत, कहानी और निबंध जैसी विविध विधाओं में सृजन कर भाषा को सशक्त आधार प्रदान किया. विशेष रूप से उनका शोधपरक कार्य ‘नागपुरी गीतों की छंद-रचना’ (सांस्कृतिक अध्ययन) अत्यंत उल्लेखनीय और मील का पत्थर माना जाता है.
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