धरती आबा फिल्म फेस्टिवल शुरू, आदिवासी सिनेमा को मंच, पहचान को स्वर

प्रथम धरती आबा आदिवासी फिल्म फेस्टिवल मंगलवार से मोरहाबादी स्थित डॉ रामदयाल मुंडा जनजातीय शोध संस्थान में शुरू हुआ.

रांची. प्रथम धरती आबा आदिवासी फिल्म फेस्टिवल मंगलवार से मोरहाबादी स्थित डॉ रामदयाल मुंडा जनजातीय शोध संस्थान में शुरू हुआ. यह फेस्टिवल जनजातीय कार्य मंत्रालय भारत सरकार और झारखंड सरकार के संयुक्त तत्वावधान में किया जा रहा है. उद्घाटन सत्र में कल्याण मंत्री चमरा लिंडा ने कहा कि सिनेमा कम्युनिकेशन का एक सशक्त माध्यम है, पर अभी भी आदिवासी समुदाय के महापुरुषों और संस्कृति पर फिल्म उद्योग का ध्यान नहीं है. उन्होंने कहा कि भगवान बिरसा मुंडा और बाकी महापुरुषों पर भी फिल्में आनी चाहिए. मौके पर विभाग के सचिव कृपानद झा ने कहा कि फिल्म निर्माण के क्षेत्र में जितनी विधाएं हैं, उतना किसी और क्षेत्र में नहीं है. इस तरह के आयोजन से आदिवासियत को बढ़ावा मिलेगा और स्थानीय फिल्मकार भी प्रोत्साहित होंगे. टीआरआइ के निदेशक कर्मा जिंपा भूटिया ने कहा कि यहां प्रदर्शित फिल्में जनजातीय जीवन को दिखाती हैं. यहां तीन दिनों में 52 फिल्में दिखायी जा रही हैं. जिन फिल्मों का चुनाव नहीं हो पाया, वे भी काफी महत्वपूर्ण थीं. उद्घाटन सत्र में फिल्म पपाया और रूट्स टू द यूनिवर्स (एनिमेशन) दिखायी गयी. पपाया शिक्षा के महत्व को दर्शाती और अभावों के बीच पलते एक आदिवासी बच्चे की कहानी है. रूट्स टू द यूनिवर्स में दिखाया गया कि कैसे ईश्वर ने पृथ्वी की रचना की और उसकी बनायी सृष्टि को मानव की विकासवादी सोच बर्बाद कर देती है. आज मणिपुर की त्रासदी को दिखाती फिल्म 2.5 आवर्स भी खूब पसंद की गयी, जिसमें दिखाया गया कि कैसे सिंगापुर में रहनेवाला एक मणिपुरी युवा इंटरनेट पर अपने राज्य की हालत देखकर स्तब्ध हो जाता है. इस घटना के बाद उसके मन में उसके अस्तित्व और पहचान से जुड़े सवाल खड़े होते हैं. वहीं आवर लैंड आवर लाइफ में ओडिशा के सिमलीपाल में बाघ परियोजना से विस्थापित होनेवाले आदिवासियों के मुद्दों को संवेदनशीलता से उठाया गया है. आज फेस्टिवल में पेनल डिस्कशन भी हुआ. इसमें अंजली मोंटेरियो, केपी जयशंकर, बीजू टोप्पो, मेघनाथ ने सिनेमा में आदिवासी जीवन से जुड़े विविध पहलुओं पर चर्चा की. इसका संचालन गुंजल इकिर मुंडा ने किया.

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