Coal Transition : 2070 तक शून्य उत्सर्जन की घोषणा के बीच झारखंड में अबतक शुरू नहीं हुआ कोल ट्रांजिशन

ऐसे हजारों लोग हैं जो झारखंड में गैरकानूनी तरीके से कोयले पर आधारित जीवन जी रहे हैं. कोल ट्रांजिशन में ऐेसे मजदूरों को चुनना और उन्हें अन्य एनर्जी स्रोतों या अन्य कामों में लगाना बहुत बड़ी समस्या है.

झारखंड की राजधानी रांची से रामगढ़-हजारीबाग की ओर जाने वाली सड़क यानी एनएच 33 पर जब आप सुबह के चार-बजे जायेंगे तो आपको कई लोग साइकिल पर आठ दस बोरियां लादे उसे ढकेलते हुए नजर आयेंगे. इन्हें आप मजदूर कह सकते हैं जो रामगढ़-कुजू जैसे इलाकों से कोयला अवैध तरीके से लाकर रांची में बेचते हैं.

ये मजदूर साइकिल को ढकेलते हुए बहुत तेजी से चलते हैं और कोयला खदानों से अवैध रूप से निकाले गये कोयले के कारोबार में जुटे हैं. ये मजदूर प्रतिदिन तकरीबन 45-50 किलोमीटर की यात्रा साइकिल को ढकेलते हुए करते हैं. पेट की आग इन्हें यह काम करने पर मजबूर करती है. इन मजदूरों का एनएच 33 पर आना-जाना रोज की बात है और इस इलाके के लोग वाकिफ भी हैं, लेकिन अगर आप इनसे बात करने की कोशिश करेंगे तो ये एकदम से भड़क जाते हैं और तसवीर लेने की बात तो खैर दीगर ही है.

कोयले की इस ढुलाई में वर्षों से शामिल जावेद साबिर काफी मान मनौव्वल के बाद बात करने के लिए तैयार हुए, उन्होंने बताया कि वे रात दो बजे कोयला लेकर कुजू से निकलते हैं और पैदल चलते हुए रांची पहुंचते हैं, उन्हें यहां इस कोयले की कीमत 160-180 रुपये प्रति बोरी मिल जाता है. वे ज्यादा कुछ बताने को राजी नहीं होते हैं, क्योंकि उन्हें भी यह पता है कि वे अवैध उत्खनन के जरिये निकाले गये कोयले की बिक्री कर रहे हैं.

वहीं जावेद जो मोटरसाइकिल पर कोयले की ढुलाई कर रहे थे, उन्होंने बताया कि वे लोग सुबह कोयले के खदान से कोयला लेकर निकलते हैं और सुबह इसे रांची में बेचते हैं. उनका कहना था कि सैकड़ों लोग इस कारोबार में जुटे हैं. जब उनसे यह पूछा गया कि अगर कोयले के खदान बंद हो जायें, तो उनपर क्या असर पड़ेगा वो बचने की कोशिश करते हुए कहते हैं कि ऐसा कभी नहीं होगा,हजारों लोग कोयले पर जिंदा हैं. अगर ऐसा कभी हुआ तो ये लोग भूखे मर जायेंगे.

ये एक उदाहरण है, कोयले से अपना जीवन चलाने वाले लोगों की. ऐसे हजारों लोग हैं जो झारखंड में गैरकानूनी तरीके से कोयले पर आधारित जीवन जी रहे हैं. कोल ट्रांजिशन में ऐेसे मजदूरों को चुनना और उन्हें अन्य एनर्जी स्रोतों या अन्य का��ों में लगाना बहुत बड़ी समस्या है.

कोल ट्रांजिशन पर एनएफआई की रिपोर्ट में कहा गया है कि अगले 49 वर्षों में अगर भारत सरकार सफलतापूर्वक कोल ट्रांजिशन को मूर्त रूप देना चाहती है तो उसे एक न्यायसंगत योजना तैयार करने की जरूरत है जो तकनीकी, सामाजिक और आर्थिक ट्रांजिशन के लिए भी जिम्मेदार होगी. सरकार को अपनी योजनाएं आम लोगों को केंद्र में रखकर बनानी होगी.

भारत में कोल ट्रांजिशन एक नया सब्जेक्ट है और इसपर काम भी बहुत कम हुआ है. यही वजह कि हमें चुनौतियों और समस्याओं का आकलन बहुत ही गंभीरता के साथ करना होगा. कोल ट्रांजिशन के लिए हमें कोयला उद्‌योग से जुड़े लोगों और उनकी स्थिति का भी गंभीरता पूर्वक अध्ययन करना होगा.

कोल ट्रांजिशन का उद्देश्य आम लोगों को सुविधा प्रदान करना है. कोयले के हमारे देश की अर्थव्यवस्था में अहम हिस्सा रहा है, इसलिए हमें यह समझना होगा कि इससे जुड़े लोगों को कैसे दूसरी ओर जो उनके लिए सुविधाजनक हो, ट्रांसफर करें. कोल ट्रांजिशन के काम में केंद्र सरकार,राज्य सरकार और स्थानीय शासन को भी मदद करनी होगी. हमें यह समझना होगा कि मजदूर किस तरह कोयले से जुड़े हैं, उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति, लिंग, आयु और शिक्षा क्या है. यह सब समझें बिना कोल ट्रांजिशन संभव नहीं है.

कोल ट्रांजिशन के लिए कुछ बातों को समझना बहुत जरूरी है जिसमें शामिल हैं-

  • • कोयला क्षेत्र से कितनी नौकरियां जुड़ी हुई हैं?

  • • जॉब प्रोफाइल की प्रकृति क्या है जो एनर्जी ट्रांजिशन के दौरान उन्हें जोखिम में डाल देगी?

  • • प्रमुख कोयला संक्रमण क्षेत्रों में मजदूरों की सामाजिक-आर्थिक रूपरेखा क्या है?

  • • एनर्जी ट्रांजिशन से कौन से जिले सबसे अधिक संवेदनशील हैं?

NFI की रिपोर्ट के अनुसार कोयला उद्योग से जुड़े मुख्यत: तीन प्रकार के जाॅब्स हैं. पहला-डायरेक्ट जाॅब, जिसके अंतर्गत कोयला खनन, ओवर बर्डन को हटाना, कोयले को तोड़ना, और कोयले की धुलाई जैसे काम और उससे श्रमिक शामिल हैं, वहीं दूसरी श्रेणी में इन डायरेक्ट वर्क शामिल हैं जिनमें रोड ट्रांसपोर्ट, रेलवे और एमजीआर शामिल है. साथ ही पावर, स्टील और ब्रिक्स से जुड़े कार्म शामिल हैं.

गौरतलब है कि भारत सरकार ने COP 26 सम्मेलन में यह कहा है कि 2070 तक भारत शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल कर लेगा. यह एक बड़ा लक्ष्य है और इसे भेदने के लिए सरकार को कोल ट्रांजिशन के काम में मेहनत करनी होगी, लेकिन झारखंड में अभी इसकी शुरुआत भी होती नजर नहीं आ रही है.

Posted By : Rajneesh Anand

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रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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