Anganwadi: केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री अन्नपूर्णा देवी ने कहा है कि वर्ष 2047 के विकसित भारत का निर्माण वे बच्चे करेंगे जिन्होंने अभी स्कूल की दहलीज तक नहीं छुई है. उनका मानना है कि एक स्वस्थ, आत्मविश्वासी और सक्षम नागरिक बनने की शुरुआत जीवन के पहले 1000 दिनों में ही हो जाती है. इसी दौर में बच्चे के पोषण, देखभाल और शुरुआती सीखने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी आंगनवाड़ी व्यवस्था निभाती है. यही कारण है कि इस वर्ष राष्ट्रीय पोषण माह 2026 की थीम "हमारी आंगनवाड़ी, हमारी जिम्मेदारी" रखी गई है, ताकि समुदाय केवल लाभार्थी नहीं बल्कि इस व्यवस्था का सक्रिय भागीदार बने.
आंगनवाड़ी बनी करोड़ों परिवारों का पहला सहारा
उन्होंने कहा कि देशभर में आज करीब 14 लाख आंगनवाड़ी केंद्र संचालित हैं, जो 8.9 करोड़ से अधिक बच्चों, महिलाओं और किशोरियों तक अपनी सेवाएं पहुंचा रहे हैं. इन केंद्रों में 25.2 लाख आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएं काम कर रही हैं, जो उसी समाज से आती हैं जिसकी वे सेवा करती हैं. बच्चे का पहला वजन, पहली ऊंचाई की माप, पहला पौष्टिक गर्म भोजन और घर के बाहर पहली बार सुने गए बाल गीत अक्सर आंगनवाड़ी से ही जुड़ते हैं. यही केंद्र गर्भवती महिलाओं और परिवारों को पोषण, स्वास्थ्य और देखभाल संबंधी जरूरी परामर्श भी देते हैं.
पोषण अभियान से जन आंदोलन बनी व्यवस्था
उन्होंने कहा कि मार्च 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पोषण अभियान की शुरुआत की थी. तब से आंगनवाड़ी व्यवस्था केवल सरकारी सेवा नहीं रही, बल्कि कुपोषण के खिलाफ राष्ट्रीय आंदोलन की आधारशिला बन गई. 9 सितंबर 2026 को राष्ट्रीय पोषण माह के नौवें संस्करण की शुरुआत इसी सोच के साथ हुई कि गुणवत्तापूर्ण सेवाएं देना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन किसी भी आंगनवाड़ी की वास्तविक ताकत तब बढ़ती है जब आसपास का समाज उसे अपनी संस्था समझकर सहयोग करे.
लाभार्थी नहीं, भागीदार बन रहा समुदाय
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि इस बार सामुदायिक भागीदारी को औपचारिक स्वरूप दिया गया है. आंगनवाड़ी प्रबंधन समितियों में माता-पिता, पंचायत प्रतिनिधि और स्वयं सहायता समूहों को शामिल किया जा रहा है, ताकि हर पात्र बच्चे तक योजनाओं का लाभ पहुंचे. सोशल ऑडिट के जरिए स्थानीय लोग खुद सेवाओं की समीक्षा करेंगे, कमियों की पहचान करेंगे और अपने निष्कर्ष दर्ज करेंगे. इससे जवाबदेही केवल सरकारी निरीक्षण तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि लाभ पाने वाले परिवार भी निगरानी की प्रक्रिया का हिस्सा बनेंगे.
मेनू बोर्ड बढ़ा रहा पारदर्शिता
उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा मेनू बोर्ड है. इसमें रोज मिलने वाले गर्म पके भोजन और टेक-होम राशन का पूरा विवरण दर्ज रहता है. जब किसी मां को पता होता है कि उसके बच्चे को क्या मिलना चाहिए, तब पारदर्शिता अपने आप बढ़ जाती है. पोषण माह के दौरान तिथि भोज, भोजन चखने के कार्यक्रम और स्थानीय व्यंजनों के प्रदर्शन जैसी गतिविधियां भी आयोजित की जा रही हैं, ताकि समुदाय भोजन की गुणवत्ता और पोषण के महत्व को बेहतर ढंग से समझ सके.
संतुलित भोजन पर दिया जा रहा जोर
केंद्रीय मंत्री अन्नपूर्णा देवी ने कहा कि सुपोषित भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए संतुलित भोजन को सबसे अहम माना गया है. जुलाई 2026 में जारी पूरक पोषण कार्यक्रम के व्यापक दिशानिर्देशों में गर्म पके भोजन की स्पष्ट व्यवस्था तय की गई है. इसमें अनाज, श्रीअन्न (मिलेट्स), दालें, मेवे, बीज, दूध, दुग्ध उत्पाद, अंडे, मौसमी फल और हरी सब्जियों को संतुलित आहार का जरूरी हिस्सा बनाया गया है. साथ ही राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 के तहत सूक्ष्म पोषक तत्वों के मानकों को भी और मजबूत किया गया है.
पोषण और पढ़ाई साथ-साथ
उन्होंने कहा कि आंगनवाड़ी केवल भोजन उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है. यहां प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा को भी उतना ही महत्व दिया जा रहा है. आंगनवाड़ी कार्यकर्ता बच्चे के शुरुआती तीन वर्षों में 34 विकासात्मक पड़ावों पर नजर रखती हैं. नवचेतना और आधारशिला पाठ्यक्रम के माध्यम से बच्चों को खेल-खेल में सीखने और स्कूल के लिए तैयार करने का प्रयास किया जा रहा है. जिस बच्चे को सही पोषण मिलता है, उसकी सीखने की क्षमता भी बेहतर विकसित होती है. इसलिए पोषण और शिक्षा को एक-दूसरे से अलग नहीं देखा जा सकता.
गर्भावस्था से शुरू होती है देखभाल
मंत्री अन्नपूर्णा देवी ने कहा कि बच्चे का भविष्य उसके जन्म से पहले ही तय होना शुरू हो जाता है. गर्भवती महिला का पोषण पूरे परिवार की जिम्मेदारी है. इस वर्ष प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के दस वर्ष भी पूरे हुए हैं. इस योजना के तहत एक दशक में 4.65 करोड़ लाभार्थियों के खातों में सीधे 21,511 करोड़ रुपये से अधिक की राशि भेजी जा चुकी है. मिशन शक्ति के तहत दूसरी संतान बेटी होने पर अतिरिक्त लाभ भी दिया जा रहा है, ताकि बालिका जन्म को प्रोत्साहन मिले और माताओं को बेहतर सहयोग मिल सके.
परामर्श से बदल रही परिवारों की सोच
उन्होंने कहा कि आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में भी यह बात सामने आई कि केवल आर्थिक सहायता देना पर्याप्त नहीं है. उसके साथ सही परामर्श और व्यवहार परिवर्तन जरूरी है. राजस्थान के कैश प्लस मॉडल की समीक्षा में पाया गया कि लगातार परामर्श मिलने के बाद भोजन पर राशि खर्च करने वाली महिलाओं का अनुपात 30 प्रतिशत से बढ़कर 89 प्रतिशत हो गया. जब पति और परिवार के अन्य सदस्य भी इस प्रक्रिया में शामिल हुए, तब मातृ पोषण से जुड़े कई भ्रम भी दूर हुए.
आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं का सम्मान जरूरी
उन्होंने कहा कि इस पूरी व्यवस्था की सबसे मजबूत कड़ी आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हैं. वर्षों से उन्होंने गांवों और मोहल्लों में लोगों का विश्वास जीता है. मंत्री ने स्पष्ट कहा कि सामुदायिक भागीदारी का अर्थ यह नहीं है कि सारी जिम्मेदारी कार्यकर्ताओं पर छोड़ दी जाए. बल्कि समाज का दायित्व है कि उनका सम्मान करे, सहयोग करे और उनके काम को और प्रभावी बनाने में योगदान दे.
हर नागरिक निभाए अपनी भूमिका
मंत्री अन्नपूर्णा देवी ने देशवासियों से अपील की है कि वे अपने क्षेत्र की कम से कम एक आंगनवाड़ी का दौरा जरूर करें. वहां जाकर कार्यकर्ता से बातचीत करें, मेनू बोर्ड देखें और यह समझें कि समुदाय किस तरह सहयोग कर सकता है. उन्होंने कहा कि इसमें केवल माताओं की नहीं, बल्कि पिताओं, दादा-दादी, नाना-नानी, पंचायतों और स्वयं सहायता समूहों की भी समान रूप से महत्वपूर्ण भूमिका है.
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विकसित भारत की असली नींव
उन्होंने कहा कि इस सितंबर जिन बच्चों का वजन आंगनवाड़ी में नापा जा रहा है, वे वर्ष 2047 में भारत की आजादी के 100 वर्ष पूरे होने पर अपने जीवन के तीसरे दशक में होंगे. वे उस समय कितने स्वस्थ, आत्मविश्वासी और सक्षम होंगे, इसकी नींव आज रखी जा रही है. यदि हर समुदाय अपनी आंगनवाड़ी को अपनी जिम्मेदारी मानकर आगे आए, तो विकसित भारत का सपना केवल सरकारी योजना नहीं रहेगा, बल्कि पूरे समाज का साझा संकल्प बन जाएगा.
