कहां गया मोरा गांव : दादी वाली दीपावली

अयोध्यानाथ मिश्रदो दिनों के बाद दीपावली महोत्सव देश में प्रकाश जन्य समृद्घि का परिचायक बन आयेगा. जगमगा उठेगा गली-कूचा और अपनी-अपनी संपदा (कालेधन का भी) नग्न प्रदर्शन नगरीय सभ्यता को तिरोहित करता हुआ कुछ पूजा, कुछ जश्न और कुछ क्या-क्या में समां जायेगा. ‘तमसो मां ज्योतिर्गमय’ की दीपावली कान फाड़ आतिशबाजी और आयातित पटाखों, गगन […]

By Prabhat Khabar Digital Desk | October 19, 2014 11:02 PM

अयोध्यानाथ मिश्रदो दिनों के बाद दीपावली महोत्सव देश में प्रकाश जन्य समृद्घि का परिचायक बन आयेगा. जगमगा उठेगा गली-कूचा और अपनी-अपनी संपदा (कालेधन का भी) नग्न प्रदर्शन नगरीय सभ्यता को तिरोहित करता हुआ कुछ पूजा, कुछ जश्न और कुछ क्या-क्या में समां जायेगा. ‘तमसो मां ज्योतिर्गमय’ की दीपावली कान फाड़ आतिशबाजी और आयातित पटाखों, गगन भेदी रॉकेट-बम (नकली) से कहीं दुबकी गायब मिलेगी. भारत के बाजार चीन के झिल मिल सलमा-सितारों तथा लक्ष्मी-गणेश से अटे-पटे रहेंगे, तो स्वस्तिक भी आयातित ही होगा. कहीं देर रात अनेक प्रकार के आर्थिक- अनार्थिक जश्नों की अलग ही बहार रहेगी. लक्ष्मी आयेंगी, छप्पर फाड़कर उनके घर जिनके पास अकूत है, पर सात घरों में झाडू-पोंछा कर जीनेवाली को, तो एक पाव करंज का तेल ही चाहिये मात्र. उसके बच्चों के पास नये कपड़े नहीं होंगे. वे टुकुर-टुकर निहारेंगे इंडिया का अभिनव आभिजात्य को. सात दशकों के इस वयस में बचपन की दादी की दीपावली याद आती है, विशिष्ट छाप प्रतिवर्ष छोड़ जाती है. दादी मायने संयुक्त परिवार के मेह (सत्ता) नियामक, निदेशक. मजाल क्या कि कोई उसके निर्णय पर प्रश्न चिन्ह खड़ा कर सके. उसे याद रहता वर्ष में कब कौन पर्व आयेगा. दादी लोक पर्व, धार्मिक आयोजन समर्पण और साधना के पवार्ें के अंतर को खूब समझती थी, जीती थी. गांव की विशेष परंपरा और सतत् समृद्घ संस्कृति के यही तो आयाम थे. उसके दरवाजे से कोई खाली हाथ नहीं लौटता, उसे पता होता किसकी रसोई से धुआं नहीं निकला. घर के दर्जनभर बच्चों में किसकी पैंट फट गयी या गंजी पुरानी हो गयी. वह जानती थी किसे क्या पसंद है. पर खाना है, एक पात में एक साथ हीं. वह हलवाहे, चरवाहे, घर में काम करने वाली, पड़ोसी महताइन के एक-एक सुख-दुख को अपना मानती थी. दीवाली गांवों में बड़े धूम-धाम से मनायी जाती थी. सबकुछ गांव की वार्टर सिस्टम आधारित आर्थिक व्यवस्था पर निर्भर थी. सूप- दौरा- टोकरी बांस ले जाकर बांसफोर बना देते, कुम्हाइन टोकरीभर कच्चा-पक्का दीया लाकर बरामदे में उतारती और धीरे-धीरे अपनी फेहरिश्त दादी को बताती. रसिआव (एक मीठी खीर) के लिए चावल, दाल पूड़ी के लिए आटा और दाल, सब्जी, दीया जलाने के लिए तेल उसे भी तो चाहिए. कुम्हारिन कहती दादी- लइकन का कपड़ो नइख और हमारी दरियादिल दादी कमोबेस सारी बातें पूरी कर देतीं. इतना ही नहीं पड़ोस की महिलाओं का तांता लगा रहता, कुछ दरवाजे से कुछ पीछे से. हमलोग कुम्हारिन की टोकरी से झपट्टा मार गुडि़या- चुकिया,जांता, चकरी, रसोई के बरतन, माटी की घंटी, मशाल का पीपा, बड़ा-बड़ा दीया उड़ा ले जाते. बंास के पोड़ के ऊपरी भाग को काटकर मशाल बनाते. एक दीप धूरा पर जलाया जाता. पर्यावरण का प्रतीक. आस-पास चाक-चौबंद साफ-सुथरा दो दिन पहले से ही आस-पड़ोस की सफाई होती. रात में बड़े बाबूजी दादी के मार्गदर्शन में दीये जलाते. हमलोग थालियों में जले दीपों को संभाल कर घर के चारों ओर कुआं, तुलसी चौरा, धान की बखार, सड़क, आम के पेड़ के नीचे, गौशाला में, सभी घरों में नवग्रह से लेकर जितने देवताओं का स्मरण हो आता उन्हें दीप दान करते. फिर दादी हम बच्चों को शुभ तेल लगाती. आस पास जगमगा उठता. दादी के चारों ओर बच्चे घेरे रहते. दादी बतासा दो ना. दादी मुझे लाई नहीं मिली, तो गुड़ डली से मेरा बच्चा वंचित रह गया. दादी मुस्कुराते हुए सबकी सुनती, सबको परोसती और खुशियां बांटती. इतना ही नहीं मुहल्ले भर की बच्चियों के माथे में दादी तेल लगाती. सुहागिनों की मांगों को सिंदूर से सजाती और बड़ी-बड़ी दुआएं देती. हमें कभी हंसी आती, तो कभी सोचने पर विवश होना पड़ता. दादी को चिंता होती कि गौशाला में क्या खिलाया है? आज तो पूड़ी (दालभरी), मीठा चावल, लाई, बतासा सबकुछ गायों-बैलों को खिलाना है. उनको नहलाना है. सिंग और खुर में तेल लगाना है. बछड़ों के गले में घंटियां बांधनी हैं. बैलों के शरीर पर लाल-हरे छाप लगाने हैं. अर्थात दीपावली केवल हमारी नहीं, सबकी. घर में बना गट्टा, लकठा, बतासा, गुण धनी, सेवा, धान की लाई प्रसाद में दादी देती. देर रात दादी चांदी-सोना के जेवरों रुपयों के साथ फूल-माला, धूप-दीप से मां लक्ष्मी की बुंद-बुदाते हुए पूजा करती. घड़े का जल हर कमरे में छिड़कती और प्रसाद वितरण होता. बाहर दरवाजे पर भीड़ दादी की प्रतीक्षा करती. शंख-घंटे बजते और लगता कोई विराट जलसा है. हमलोग दिनभर दूसरों के बाग से फूल, केलास्तंम और आम के पल्लव लाते. आज के इस वैराटय् प्रदर्शन में लगता है, मेरी दीपावली गुम हो गयी है. नव अर्थवाद की कृत्रिम संस्कृति ने ग्राम्य जीवन के आधार वस्तु विनिमय को निगल लिया है. अब छप्पर का कद्दू पवार्ें में बंटता नहीं, बिकता है. सभी आत्मनिर्भर, सक्षम और समर्थ हैं. दीपावली विज्ञापन, प्रचार के माध्यम से बाजारबाद और अकूत काले धन का नग्न प्रदर्शन रह गया है. लक्ष्मी पूजा है, पर अपने-अपने बिसात के अनुसार. मुझे मेरी दादी वाली दीपावली अति प्यारी लगती है. काश! एक बार वैसी दीपावली मनाता. नव अर्थवाद ने न केवल आदमी को एकाकी बनाया अपितु संस्कार जन्य संव्यवहारों पर भी कुठाराघात किया. गांव में भी अब दादी कहां ? अबतो वह देश-विदेश में कमानंुपूत के पास दिन गिन रही है. हम पवार्ें के बहाने भी अपनी संस्कृति को संजाये, तो दादी की दीपावली याद आती रहेगी.