मुकेश के पिता की मृत्यु हो चुकी थी़ उसकी विधवा मां ने बड़े जतन से उसका लालन-पालन किया और धूमधाम से उसकी शादी की़ मुकेश की नौकरी दिल्ली में लगी़ वह अपने छोटे परिवार के साथ वहीं बस गया और घर-दफ्तर की जिम्मेदारियों में व्यस्त हो गया़ उसकी बूढ़ी मां घर में अकेले रह गयी.
वह कई दिनों से बीमार थी़ मुकेश उसे देखने के लिए घर आना चाहता था, लेकिन नौकरी और पारिवारिक व्यस्तता के कारण कई बार वह टालता गया़ उसकी मां ने सोचा कि इस क्रिसमस में बेटा जरूर घर आयेगा़ लेकिन मुकेश बच्चों को घुमाने अंडमान ले गया़ नये साल के बाद खबर आयी कि उसकी मां का स्वर्गवास हो गया है़ मुकेश प्लेन पकड़कर घर आ गया़ वह इतना रोया कि उसकी आंखें सूज गयी़ं, लेकिन अब यह सब एक नाटक ही लग रहा था़ अब तो कुछ भी नहीं हो सकता था़
यह सोचने की बात है कि जब आदमी जिंदा होता है तब हम उसकी कद्र क्यों नहीं करते? उसे वो सम्मान क्यों नहीं देते जिसका वह हकदार होता है?
संभव है कि हमारे द्वारा उसे वो इज्जत मिली होती, तो शायद वह मरता ही नही़ं जीवन की डोर बहुत कमजोर है़ न जाने कब छूट जाये़ इस जीवन के रहते हुए सभी का आदर करो, सम्मान करो, खुशी बांटो और समय दो़ ताकि बाद में यह कहना न पड़े- काश मैं उसकी फलां इच्छा पूरी कर पाता़ यह एक कटु सत्य है कि जाने वालों की बस याद आती है, वे कभी वापस नहीं आते़ तो इस क्रिसमस आप किस प्रियजन से मिलने के लिए समय निकाल रहे हैं?
-फादर अशोक कुजूर, डॉन बॉस्को यूथ एंड एजुकेशनल सर्विसेज बरियातू के निदेशक
