आगमन का पुण्यकाल-14 : हमें खुश देखना चाहते हैं ईश्वर

किसी आश्रम में एक साधु रहते थे. लोग अपनी समस्याएं लेकर आते थे और वे उनका समाधान करते थे. एक बार एक व्यक्ति ने उनसे पूछा कि ‘गुरुदेव’, खुश रहने का क्या राज है? साधु ने उससे कहा, ‘तुम मेरे साथ जंगल चलो, वहीं मैं तुम्हें खुश रहने का राज बताता हूं. वे दोनों जंगल […]

किसी आश्रम में एक साधु रहते थे. लोग अपनी समस्याएं लेकर आते थे और वे उनका समाधान करते थे. एक बार एक व्यक्ति ने उनसे पूछा कि ‘गुरुदेव’, खुश रहने का क्या राज है? साधु ने उससे कहा, ‘तुम मेरे साथ जंगल चलो, वहीं मैं तुम्हें खुश रहने का राज बताता हूं.
वे दोनों जंगल की ओर निकल पड़े. रास्ते में साधु ने एक बड़ा सा पत्थर उठाया, उस व्यक्ति को दिया और कहा, इसे पकड़ो और चलो. उस व्यक्ति की समझ में नहीं आया कि साधु उससे ऐसा करने को क्यों कह रहे हैं और इसमें खुश रहने का क्या राज हो सकता है?
उस व्यक्ति ने बिना कोई सवाल-जवाब किये साधु की बात मान ली और पत्थर उठाकर चुपचाप चलने लगा. कुछ समय बाद उसके हाथ में दर्द होने लगा, पर वह चुपचाप चलता रहा. लेकिन जब दर्द सहा नहीं गया, तो उसने साधु को यह बात बतायी. साधु ने उसे पत्थर नीचे रख देने को कहा. पत्थर नीचे रखते ही उस व्यक्ति को बड़ी राहत महसूस हुई. तब साधु ने कहा- खुश रहने का राज यही है. दुखों के बोझ को हम जितना ज्यादा समय अपने जीवन में रखेंगे, उतने ही ज्यादा दुखी और निराश रहेंगे.
जब हम किसी को माफ नहीं करते, तो उस व्यक्ति को हम घंटों अपने सर पर लिये घूमते हैं. किसी वस्तु की लालसा हो जाये, तो यह हमें चैन से जीने नहीं देता. खुशी का राज यही है कि हम उन बातों को जमीन पर रख दें, जो हमें तकलीफ देते हैं. चाहे वह दुख हो, कोई व्यक्ति हो या कोई वस्तु़ आगमन काल हमें यह सोचने का अवसर देता है कि हम एक ही दुख के कारण बार-बार दु:खी क्यों हों? किसी की गलती को हम कई दिनों, सालों तक क्यों अपने दिल पर लगाये रहते हैं. याद रखें, ईश्वर हमें खुश देखना चाहते है़ं
फादर अशोक कुजूर, डॉन बॉस्को यूथ एंड एजुकेशनल सर्विसेज बरियातू के निदेशक

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