मात्र 1000 रुपये के लिए मौत से खेलते हैं ये खिलाड़ी

रांची : जगन्नाथ मेले में ही नहीं देश के किसी कोने में कोई मेला लगा है सबसे ज्यादा ध्यान खींचता है मौत का खेल . मौत का कुंआ जहां अब बुलेट जैसी भारी भरकम गाड़िया चलने लगी है और दावा है कि यहां हम कोई भी गाड़ी चला सकते हैं चाहे वो कितनी भी भारी […]

रांची : जगन्नाथ मेले में ही नहीं देश के किसी कोने में कोई मेला लगा है सबसे ज्यादा ध्यान खींचता है मौत का खेल . मौत का कुंआ जहां अब बुलेट जैसी भारी भरकम गाड़िया चलने लगी है और दावा है कि यहां हम कोई भी गाड़ी चला सकते हैं चाहे वो कितनी भी भारी हो. इस खेल में खतरा है, रोमांच है , डर है शायद यही सब मिलकर इस खेल को लोकप्रिय बनाते हैं. रांची के जगन्नाथ मेले में मौत के कुएं का खेल चल रहा है. कई जवान लड़के इस खेल से दर्शकों में रोमांच पैदा कर रहे हैं.

मौत के कुएं में बुलेट की सवारी
मोहम्मद अली पहले मिकेनिक थे अब मौत के खेल में एक खिलाड़ी है. मोहम्मद अली कहते हैं, मेरी दोस्ती मौत के कुआं में गाड़ी चलाने वालों से हुई और मैं इस पेशे में आ गया. साल 2006 से मैं इस पेशे से जुड़ा हूं. मुझे जब बुलेट चलाने की इजाजत मिली तो खुश हुआ क्योंकि इस खेल में यामहा तो सभी चलाते हैं मुझे बुलेट चलाने की इजाजत मिली थी. मैंने बुलेट चलाने से पहले ट्रेनिंग ली है लेकिन गलतियां होती रहती है मौत का खेल है तो खतरा है ही.
मोहम्मद कहते हैं मेरे घर में मेरे मां – बाबा, भाई- बहन है. कभी – कभी वह भी खेल देखने आते हैं. किस मां – बाप को यह पसंद होगा कि उनका बेटा रोज इस तरह मौत से खेले लेकिन मेरे पास और कोई काम नहीं है. मैं पूरा भारत घूम चुका हूं. मुझे सबसे ज्यादा पसंद है हैदराबाद के लोग यहां के लोग हमारी कला को समझते हैं, सम्मान देते हैं. क्या आप इस पेशे में किसी अपने को आने की सलाह देंगे इस पर मोहम्मद कहते हैं, बिल्कुल नहीं इस पेशे में किसी अपने को आने की सलाह नहीं दूंगा.
मौत के खेल में डर तो है
छत्तीसगढ़ में रायपुर के रहने वाले राज 10 साल की उम्र से इस पेशे में है. राज बताते हैं कि मैंने बहुत पहले से यह सब देखा है. मैंने लंबे वक्त से सीखा है. इन दस सालों में बहुत कुछ देखा है लेकिन काम है करना तो है. मुझे घर पेशे भेजने होते हैं. हर रोज हमारी कमाई लगभग 1 हजार रुपये होती है और हर दिन 10- से 15 शो करने होते हैं. अगर कोई इस पेशे में आना चाहता है तो उसे एग्रीमेंट करना होता है. घर वालों से इजाजत लेनी होती है. ट्रेनिंग में लगभग 2 सालों का वक्त लगता है. पूरी ट्रेनिंग होने के बाद ही आपको इस तरह के शो में मौका मिलता है.
32 साल के सफर में बहुत कुछ देखा है
सुबोध कुमार दास 32 सालों से इस पेशे में हैं. सुबोध कहते हैं मैंने इन 32 सालों में बहुत कुछ देखा है. कई लड़के तैयार किये हैं , कई लड़कों को इस पेशे को छोड़कर जाते देखा है. अभी भी हमारी कंपनी में 150 बच्चे तैयार हैं . मैं पहले लेबर का काम करता था लेकिन जब इस पेशे से जुड़ा इसी का हूं. हमने वह दौर देखा है जब गड्ढा कुंआ चलता था. आज तो चीजें आसान हो गयीं हैं लेकिन पहले खतरा और ज्यादा था. बारिश और कीचड़ की वजह से गड्ढे वाले कुएं में बाइक धसने का खतरा होता था. अब तो लकड़ी का है लगता है जैसे लड़के हाइवे में चला रहे हैं. सुबोध कहते हैं, खेल में खतरा तो बढ़ाना होगा ना हम दूसरे देश से कम हैं क्या अगर वहां के मेले में मनोरंजक और खतरनाक करतब कर सकते हैं तो हम हम चीन, रूस और जापान से इन खेलों में आगे हैं.
मौत को मजाक में ना लें
इस तरह के खेल से युवा प्रभावित होकर सड़क पर स्टंट करते हैं. इस सवाल पर सुबोध कहते हैं युवा हर चीज को मजाक में लेते हैं. यह कला है मजाक नहीं है. इसकी पूरी ट्रेनिंग होती है.हम सड़क पर प्रेक्टिस नहीं कराते. युवा स्टाइल दिखाने के लिए रौब झाड़ने के लिए स्टंट करते हैं इसका नुकसान भी उन्हें होता है. इस तरह के खेल को मजाक में नहीं लेना चाहिए. सुबोध से जब हमने इस खेल के सबसे बड़े खिलाड़ी का नाम पूछा तो उन्होंने कहा, सिसई का रहने वाला एक आदिवासी लड़का गणेश उरांव इस खेल का सबसे बड़ा खिलाड़ी है.
मौत के कुंआ में चलने वाली गाड़ियों में नहीं होता कोई बदलाव
मौत के कुएं में चलने वाली गाड़ियां साधारण होती है. गाड़ियों में थोड़ा बदलाव एक्सीलेटर को लेकर होता है. इसके अलावा गाड़ियां बिल्कुल सामान्य होती है. ये गाड़ियां सड़क पर भी चलती हैं औऱ मौत के कुएं में भी.

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