चालीसा का पुण्यकाल- 35 : पाप के दंश से बचें

‘रसेल वाइपर’ बेहद विषैला सांप है. भारत व एशिया देशों में इनकी काफी संख्या है. इसकी दो-तीन विशेषताएं इसे अन्य विषैले सांपों से कुछ अलग करती हैं. यह सांप खतरे का एहसास होने पर अपना विष थूकता है और इसका निशान इतना सटीक होता है कि इनसान की आंखें बिल्कुल बंद हो जाती हैं. यह […]

‘रसेल वाइपर’ बेहद विषैला सांप है. भारत व एशिया देशों में इनकी काफी संख्या है. इसकी दो-तीन विशेषताएं इसे अन्य विषैले सांपों से कुछ अलग करती हैं. यह सांप खतरे का एहसास होने पर अपना विष थूकता है और इसका निशान इतना सटीक होता है कि इनसान की आंखें बिल्कुल बंद हो जाती हैं.
यह सांप फुफकार मारता है, जो इस बात का प्रतीक है कि वह खतरे से डरा हुआ है. अगर यह सांप डंस ले तो यह इनसान की रक्त कोशिकाओं और तंत्रिका तंत्र को तुरंत प्रभावित करता है. विष के प्रभाव से इनसान का तरल रक्त सख्त होने लगता है और तंत्रिका तंत्र धीरे-धीरे अपना काम काम बंद कर देती हैं.
तुरंत इलाज कराने से मरीज की जान बच सकती है. हम में से अधिकतर लोगों को सांप के काटने का अनुभव नहीं हुआ है. ऐसा नहीं हो, तो अच्छा है. पर हम सभी पाप रूपी सांप के दंश से बच नहीं पाए हैं. हममें पाप करने की प्रबल प्रवृत्ति है. पाप का दंश हमें बार-बार पाप कर्म की ओर प्रेरित करता है. शैतान को सांप का प्रतीक माना गया है क्योंकि सांप और शैतान, दोनों छिप कर वार करते हैं.
अगर हम दूसरों को माफ नहीं करते, हमेशा दूसरों के विरुद्ध बातें करते हैं, चोरी करते, व्यभिचार करते, लड़ाई- झगड़े आदि करते हैं, तो निश्चित ही हमें पाप के सांप ने काटा है. जिस तरह इस्रायलियों को मरुभूमि में सांप के काटने पर कांसे के सांप की ओर दृष्टि करने के लिए कहा गया था, वैसे ही चालीसा काल हमें पाप रूपी सांप के दंश से बचने के लिए यीशु मसीह के क्रूस की ओर अपना ध्यान लगाने का आह्वान कर रहा है.
– फादर अशोक कुजूर, डॉन बॉस्को यूथ एंड एजुकेशनल सर्विसेज बरियातू के निदेशक

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