रामकिशोर साहू
विश्व की सबसे शक्तिशाली साम्राज्यवादी ताकतों से सीधे टकराना मामूली बात नहीं होती, लेकिन किसान परिवार के एक 23 वर्षीय युवा ने अपने फौलादी इरादों से ब्रिटिश सरकार की नींद हराम कर दी. यह युवा थे सरदार भगत सिंह. ब्रिटिश सरकार स्वतंत्रता आंदोलनों में संलग्न नेताओं को उलझा कर परेशान रखना चाहती थी. श्रमिकों व मेहनतकशों के शोषण के लिए ‘ट्रेड डिस्प्यूट बिल’ व ‘पब्लिक सेफ्टी बिल’ के लिए सरकार तैयार थी. इनसे श्रमिकों की हड़ताल दबा दी जायेगी. गरीबों के भोजन व तन ढंकने के लिए कपड़ों की भारी समस्या थी.
ब्रिटिश सरकार इन बातों पर ध्यान नहीं देती थी. इनका खून चूसना मानो सरकार का मुख्य काम था. फलत: क्रांतिकारियों ने लाला लाजपत राय की क्रूरतम हत्या के साथ इन दोनों बिलों का सशक्त विरोध करने का मन बना लिया. इसके लिए केंद्रीय असेंबली में जोरदार बम धमाके की योजना बनी. भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त को यह जिम्मेवारी मिली. भगत सिंह कोर्ट में अपना पक्ष जबर्दस्त रूप से रखने में योग्य थे तो बटुकेश्वर दत्त बम बनाने में माहिर.
भगत ने स्पष्ट कर दिया था कि बम मात्र तेज आवाज करनेवाला होगा. इससे न कोई गंभीर घायल होगा न किसी की जान जायेगी. जंगल में किये गये की परीक्षणों से बटुकेश्वर इस श्रेणी के बम बनाने में सफल हो गये.भगत व बटुकेश्वर हर शाम केंद्रीय असेंबली भवन जाते और वहां की गतिविधियों का अवलोकन करते, लगता मानो ये दोनों यहां के स्टाफ हों. 8 अप्रैल 1922 को असेंबली की अनुशंसा से पास प्राप्त दोनों प्रेक्षक स्थल में सबसे आगे की सीट पर बैठ गये. असेंबली हॉल में सर साइमन, जॉर्ज शुस्टर, सर जेम्स फ्रेर, सरदार बिट्ठल भाई पटेल, पं मोतीलाल नेहरू, मदन मोहन मालवीय, डॉ मुंजे व अन्य उपस्थित थे.
अध्यक्ष बिट्ठल भाई पटेल ने दिन के साढ़े 12 बजे बोलना शुरू ही किया था कि पीछे की खाली बेंचों को निशाना बना कर भगत सिंह ने पॉकेट से बम निकाल कर फेंक दिया. जोरों का धमाका हुआ. इसके बाद बटुकेश्वर ने उसी निशाने पर बम विस्फोट कर दिया. ‘इंकलाब जिंदाबाद साम्राज्यवाद मुर्दाबाद के गगनभेदी नारों के साथ कमांडर इन चीफ बलराम हस्ताक्षरित पर्चियां फेंकी गयीं. दोनों विस्फोटों से सात लोगों को मामूली खरोंच आयी.
विस्फोट के बाद भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त धैर्य, साहस व निर्भिकता के साथ अपने स्थान पर खड़े रहे. चले मुकदमे में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव सिंह को फांसी तथा बटुकेश्वर दत्त को कालापानी की सजा दी गयी. इन्हें फांसी न देने के लिए दो लाख से अधिक भारतीयों ने ब्रिटिश सरकार से अपील की थी. सुभाष चंद्र बोस ने कहा था -‘भगत सिंह आज एक आदमी नहीं बल्कि तरुण भारत की एक पहचान हैं, भारतीय क्रांति की पहचान हैं.
भगत सिंह ने कहा था ‘साम्राज्यवादी शासकों के बहरे कानों को खोलने के लिए जोरदार आवाज की जरूरत है. हम ब्रिटिश सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए युद्ध किये गये युद्धबंदी हैं, फलत: हमें फांसी ने दे कर हमें गोलियों से उड़ा दिया जाय.’ सरकार नहीं मानी और 3 मार्च 1930 को लाहौर जेल में फांसी दे दी गयी. भारत की जनता इन्हें शहीद-ए-आजम कहती है, लेकिन भारत सरकार इन्हें आज तक शहीद का दर्जा नहीं दे पायी. हम कब इनके ऋण से उऋण हो सकेंगे.
(लेखक राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त पूर्व प्रधानाध्यापक हैं.)
