चालीसा का पुण्यकाल - 27 : जीवन का मूल्य समझें, ईश्वर की इच्छानुसार जीवन बितायें

एक युवक अपने जीवन से हताश था. उसकी जिंदगी में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा था. जिंदगी बोझ लगने लगी थी. निराश होकर उसने अपनी जिंदगी को खत्म करने का निश्चय किया और एक नदी के किनारे चला गया. वह नदी में कूदने ही वाला था कि एक बुजुर्ग ने उसे पीछे से पकड़ […]

एक युवक अपने जीवन से हताश था. उसकी जिंदगी में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा था. जिंदगी बोझ लगने लगी थी. निराश होकर उसने अपनी जिंदगी को खत्म करने का निश्चय किया और एक नदी के किनारे चला गया.
वह नदी में कूदने ही वाला था कि एक बुजुर्ग ने उसे पीछे से पकड़ लिया और खींच कर नदी से दूर ले गया. बुजुर्ग ने पूछा कि वह मरना क्यों चाहता है? लड़के ने उदास स्वर में अपनी पूरी कहानी सुनायी़
कुछ देर बाद बुजुर्ग ने कहा- यदि ऐसी बात है, तो तुम्हें मर ही जाना चाहिए. पर मरने के पहले मैं तुम्हारी कुछ मदद करना चाहता हूं. मैं तुम्हें पांच लाख रुपये दे सकता हूं.
यदि तुम इसके बदले अपनी आंखें मुझे दे दो. मैं तुम्हारे दिल के बदले दस लाख और किडनी के लिए 15 लाख देने के लिए तैयार हूं. मरने के बाद वैसे भी ये चीजें तुम्हारे कोई काम की नही़ं लड़के ने आक्रोशित होते हुए कहा कि वह एक करोड़ देेने पर भी अपने शरीर का कोई अंग नहीं देगा. तब बुजुर्ग ने कहा कि जब तुम जानते हो कि तुम्हारे शरीर की कीमत करोड़ों में है, तो उसे यूं ही पानी में क्यों बहा देना चाहते हो? युवक को बात समझ में आ गयी़
ईश्वर ने जब हमें जिंदगी दी है, तो उन्होंने हमारे लिए कोई न कोई योजना जरूर बनायी है. जीवन को समाप्त करने जैसे विचार ईश्वर की योजना को न समझने वाली बात है. जीवन का मूल्य समझें और ईश्वर की इच्छानुसार जीवन बितायें.
फादर अशोक कुजूर, डॉन बॉस्को यूथ एंड एजुकेशनल सर्विसेज बरियातू के निदेशक

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