मधुमक्खी पालन से जनजातीय आबादी की आजीविका एवं उद्यमिता विकास विषय पर प्रशिक्षण का आयोजन
किसानों की आय बढ़ाने के लिए जिले में कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से क्रियान्वित की जायेगी यह परियोजना
रांची : झारखंड राज्य के जंगल, करंज, जामुन, नीम, सखुआ, सागवान, शीशम, सेमल, युक्लिप्टस, इमली, बकाईन आदि पेडों से भरे हैं. यहां की जमीन लीची, अमरूद, केला, पपीता, सहजन, सरगुजा एवं अन्य साग-सब्जियों के लिए भी बहुत बेहतर है. इन पौधों से भी शहद उत्पादन में मदद मिलती है, जिससे शहद का उत्पादन अधिक होता है.
इसे देखते हुए झारखंड राज्य मधुमक्खी पालन के लिए अत्यंत ही उपयुक्त है. उक्त बातें बीएयू के प्रसार शिक्षा निदेशक डॉ आरएस कुरील ने कहीं. वे ‘मधुमक्खी पालन से जनजातीय आबादी की आजीविका एवं उद्यमिता विकास’ विषयक तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का उदघाटन कर रहे थे.
डॉ कुरील ने कहा कि राज्य के करीब 90 प्रतिशत छोटे और मध्यम भूमि के जोतदार किसानों के सामाजिक-आर्थिक विकास तथा बेहतर रोजगार सृजन के लिए मधुमक्खी पालन क्षेत्र में काफी अवसर हैं. कीट विज्ञान विभाग के अध्यक्ष डॉ पीके सिंह ने बताया कि चीन द्वारा सबसे अधिक मधु उत्पादन के बावजूद विदेशों में भारतीय मधु की काफी मांग है.
नोडल पदाधिकारी एवं कार्यक्रम संयोजक डॉ मिलन चक्रवर्ती ने प्रशिक्षण के महत्त्व और विषय पर प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि किसानों की आय बढ़ाने के लिए यह परियोजना पाकुड़ा, साहेबगंज, दुमका, पूर्वी सिंहभूम, पश्चिमी सिंहभूम, रांची, लोहरदगा, लातेहार, सिमडेगा और गढ़वा जिले में कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से क्रियान्वित किया जायेगी. संचालन व धन्यवाद ज्ञापन डॉ कुमुद सिंह ने किया.
मौके पर डॉ विनय कुमार, डॉ दीपक जायसवाल, डॉ आइ दीपक, डॉ ललित दास, डॉ अमृत झा, डॉ कंचन बाला, डॉ सुधीर झा, डॉ एके द्विवेदी, डॉ एसपी कुमार आदि मौजूद थे.
