किसी गांव में एक संन्यासी रहते थे. वे दिन भर लोगों को उपदेश-प्रवचन दिया करते थे. उसी गांव में एक नर्तकी भी थी, जो लोगों के सामने नाचकर उनका मन बहलाया करती और अपना पेट पालती थी. एक दिन भूकंप आया और संन्यासी व नर्तकी दोनों भूकंप में दब कर मर गये. मरने के बाद दोनों ईश्वर के सामने प्रस्तुत हुए जहां उनका न्याय होने वाला था.
संन्यासी खुद को स्वर्ग मिलने को लेकर पूरा आश्वस्त थे, वहीं नर्तकी कुछ अनिष्ट की आशंका लिए खड़ी थी. तभी घोषणा हुई कि संन्यासी को नरक और नर्तकी को स्वर्ग दिया जाता है. इस फैसले को सुनकर संन्यासी गुस्से से चिल्लाये – यह कैसा न्याय है प्रभु? मैं जीवन भर लोगों को उपदेश दिया पर मुझे नरक नसीब हुआ. जबकि, यह स्त्री जीवन भर लोगों को रिझानें के लिये नाचती रही और इसे स्वर्ग दिया जा रहा है.
ईश्वर ने शांत भाव से उत्तर दिया – यह नर्तकी अपना पेट पालने के लिये नाचती थी, लेकिन इसके मन में यही भावना थी कि वह अपनी नृत्य कला ईश्वर के चरणों में समर्पित कर रही है. जबकि तुम उपदेश देते हुए भी यह सोचते थे कि काश तुम्हें भी नृत्य देखने को मिल जाता. शायद तुम ईश्वर का यह महत्वपूर्ण संदेश भूल गये कि इंसान के कर्म से अधिक कर्म करने के पीछे का मनोभाव ज्यादा मायने रखता है.
किसी ने सही कहा है – ऊपरवाला नीयत देखता है, हैसियत नहीं. यीशु मसीह ने कहा है – जो बुरी इच्छा से किसी स्त्री पर दृष्टि भी डालता है, वह अपने मन में उसके साथ व्यभिचार कर चुका है. ईश्वर का वचन कहता है – मैं बलिदान नहीं, दया चाहता हूं. हम किसी का बुरा न भी करें, पर दिल में यह भावना रखें कि उसका बुरा हो जाये, तो यह पाप है. इस चालीसा काल में हम अपनी नीयत ठीक रखें क्योंकि एक दिन इसी नीयत के कारण हमारा न्याय होने वाला है.
– फादर अशोक कुजूर, डॉन बॉस्को यूथ एंंड एजुकेशनल सर्विसेज बरियातू के निदेशक
