रांची : वरिष्ठ साहित्यकार और प्रोफेसर डॉ शिवशंकर मिश्र अब हमारे बीच नहीं रहे. रविवार 23 दिसंबर को दिल्ली के एम्म में उन्होंने आखिरी सांस ली. वो 78 वर्ष के थे.
डॉ शिवशंकर की साहित्यिक यात्रा लगभग 50 वर्षों की रही है. जिसमें उन्होंने कविता, गीत, गजल, मुक्तक के साथ-साथ नाटक, कहानी, व्यंग्य एवं आलोचना के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का परिचय दिया.
डॉ मिश्र की अबतक प्रकाशित पुस्तकों की संख्या 25 है. कुछ प्रकाशन की प्रक्रिया में हैं. 1972 से 2005 तक उन्होंने योगदा सत्संग कॉलेज रांची में अंग्रेजी के प्रोफेसर के रूप में अपनी सेवा दी. उन्होंने दोयम दर्जे के लेखन को कभी भी स्वीकार नहीं किया और न ही किसी पुरस्कारओं की परवाह की!
यही कारण है कि उनकी रचनाओं का सही मायने में मूल्यांकन नहीं हो पाया. उन्होंने इन सारी बातों से बेपरवाह होकर अपना लेखन निरन्तर जारी रखा. कुछ माह पूर्व अपने प्रिय कथाकार द्विजेन्द्रनाथ मिश्र की शताब्दी वर्ष में हुई उपेक्षा से मर्माहत होकर उन पर केन्द्रित एक पुस्तक की रचना तो की ही, साथ ही उनकी साहित्य जगत में हुई उपेक्षा की ओर भी ‘वागर्थ’ पत्रिका के माध्यम से अपना पक्ष प्रखरता के साथ रखा.
पुस्तक एवं पत्रिकाओं के संपादक के रूप में में उनके अनुभव गहरे रहे हैंष्. जिस सत्य को प्रायः सभी स्वीकार करते रहे हैं. भाषा पर उनका असाधारण अधिकार रहा. वे छन्द को मुक्तछंद एवं गद्य कविता में बदलने की ताकत रखते थे.वे बिना सोचे – समझे प्रतिक्रिया व्यक्त करने के पक्षधर कभी नहीं रहे. वे एक – एक शब्द का प्रयोग बहुत नाप – तौलकर कर करते थे. चाहे वह साहित्य सृजन का क्षेत्र हो या वक्तव्य का, सर्वत्र सतर्कता बरतने की जैसी आदत – सी पड़ गयी थी.
