प्रभात खबर से विशेष बातचीत में निधि खरे ने कहा, एमबीबीएस कोर्स में ह्यूमन बिहेवियर भी शामिल हो

स्वास्थ्य विभाग की प्रधान सचिव निधि खरे का मानना है कि स्वास्थ्य विभाग में सबसे बड़ा बदलाव जो होना चाहिए, वो है डिग्निटी ऑफ ट्रीटमेंट का. हर चिकित्सक को मरीजों के प्रति व्यवहार बेहतर रखना होगा. एमबीबीएस के कोर्स में मेडिसिन के साथ-साथ ह्यूमन बिहेवियर को जज करने का प्रशिक्षण भी दिया जाना चाहिए, क्योंकि […]

स्वास्थ्य विभाग की प्रधान सचिव निधि खरे का मानना है कि स्वास्थ्य विभाग में सबसे बड़ा बदलाव जो होना चाहिए, वो है डिग्निटी ऑफ ट्रीटमेंट का. हर चिकित्सक को मरीजों के प्रति व्यवहार बेहतर रखना होगा. एमबीबीएस के कोर्स में मेडिसिन के साथ-साथ ह्यूमन बिहेवियर को जज करने का प्रशिक्षण भी दिया जाना चाहिए, क्योंकि मरीज डॉक्टर पर आश्रित होते हैं. श्रीमती खरे केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर पा रही हैं और मंगलवार को गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव के पद पर योगदान देंगी. सोमवार को वह स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव का पदभार त्याग देंगी. स्वास्थ्य विभाग में श्रीमती खरे ने कई सुधार के काम किये हैं. प्रभात खबर के प्रमुख संवाददाता सुनील चौधरी ने उनसे बातचीत की है. पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश़…..
लगभग सात महीने आप स्वास्थ्य विभाग की प्रधान सचिव रहीं. इस दौरान स्वास्थ्य के क्षेत्र में काफी सुधार हुए. क्या कारण था, काम करने का स्टाइल कैसा था व कैसे आपने यह काम कर दिखाया?
मुझे लगता है कि हर जगह अच्छे लोगों की कमी नहीं है.विभाग के नेतृत्वकर्ता को शीर्ष पदों पर जवाबदेह, ईमानदार और निष्ठा से काम करने वालों को लगाना चाहिए. कई जगह ऐसा होता है कि कुछ कंसीडेरेशन एड हो जाता है. ऐसे में जो सच में ईमानदारी से काम करते हैं, उनका मनोबल टूटता है.
कुछ ऐसे लोग काबिज हो जाते हैं, जिनका एक मात्र ध्येय रह जाता है अपने पद को बचाना. तब जनता से कोई मतलब नहीं रह जाता. मैंने अपने बहुत ही छोटे से कार्यकाल में ये सुनिश्चित किया कि जो भी ऐसे पद हैं, जहां पर जनता की सबसे अधिक सेवा की जरूरत है कम से कम उन पदों पर निश्चित रूप से अच्छे छवि के अफसर को ही रखा जाये. अगर विभाग में कुछ भी अच्छा हुआ है, तो एक टीम वर्क के कारण हुआ है.
काम करने में सरकार से आपको कितना सहयोग मिला?
सरकार से पूरा सहयोग मिला. हमारे विभागीय मंत्री हमेशा समर्थन में रहे. उनकी भी तीव्र इच्छा है कि विभाग का आउटपुट बेहतर हो.
आपकी नजरों में हेल्थ सेक्टर में सुधार के लिए क्या किया जाना चाहिए?
हेल्थ सेक्टर में बहुत सारी चुनौतियां हैं. हेल्थ सेक्टर को सिर्फ डॉक्टर की कमी से नहीं जोड़ना चाहिए. वास्तव में एक इको सिस्टम तभी कामयाब होगा, जब वहां पर नर्सेस, पारा मेडिकल स्टाफ, एएनएम, पैथोलॉजिस्ट, लैब टेक्निशियन और हर तरह के लोग इसमें आयें और उनकी कमी दूर करने के लिए प्रशिक्षण केंद्र खोले जायें.
झारखंड से अभी भी मरीज गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए वेल्लोर या एम्स दिल्ली का रुख करते हैं, यहां पर ही मरीजों कोसारी सुविधाएं मिले, इसके लिए क्या करना चाहिए?
सरकारी स्तर पर दो तरह के हेल्थ केयर की सुविधा दी जाती है. एक प्राइमरी लेबल और दूसरा स्पेशियलिस्ट के स्तर पर.हमारे यहां दोनों का अभाव है. न तो पब्लिक हेल्थ में डॉक्टर अच्छी संख्या में हैं और न ही स्पेशलिस्ट हैं.
जहां स्पेशियलिस्ट की चिकित्सा है, वहां इंफ्रास्ट्रक्चर और मशीन की जरूरत है. झारखंड दोनों ही फ्रंट पर जूझ रहा है. पर आपने देखा होगा कि विगत 50 साल से झारखंड में 350 एमबीबीएस की सीट ही थी. जब तक आप इसको बढ़ायेंगे नहीं, तब तक ये डॉक्टर आपके स्टेट में रुक नहीं सकते. दुमका, हजारीबाग, पलामू,कोडरमा,चाईबासा, बोकारो, देवघर एम्स, जमशेदपुर में टाटा व मणिपाल के मेडिकल कॉलेज को एक साल में हम पूरा कर लेते हैं, तो एक साल में चार गुनी सीटें यानी 1200 सीटें हो जायेंगी. यानी पांच साल में छह हजार एमबीबीएस मिल जायेंगे.
जब छह हजार मिलने लगेंगे, तब डिमांड-सप्लाई का गैप पूरा हो जायेगा. तब हमें बाहर नहीं जाना होगा.
राज्य का सबसे बड़ा अस्पताल रिम्स है, इसे और बेहतर करने के लिए क्या होना चाहिए?
रिम्स मैनेजमेंट में सबसे मूलभूत परिवर्तन किया गया कि रिम्स को दो प्रशासनिक अधिकारियों को दिया गया, ताकि जो प्रशासनिक समस्याएं होती हैं उसमें ये पदाधिकारी अपने अनुभवों से पब्लिक की सेवा को बेहतर कर सकें.
इसके साथ-साथ निदेशक को थोड़ी कठोरता से ये सुनिश्चित करना होगा कि सभी एचओडी और डॉक्टर समय पर रहें और राउंड पर रहें केवल पीजी डॉक्टर के ऊपर निर्भर न रखें. हम एम्स की तरह वेतन और एनपीए दे रहे हैं. इसके बावजूद वे नहीं रहते हैं, तो कठोर कार्रवाई भी करनी होगी.
पीएचसी लेवल पर आज भी डॉक्टर की उपस्थित नहीं हो पाती. इसके लिए क्या करना चाहिए?
देखिये, हमारी रणनीति थी कि हर जिले में एक अस्पताल ऐसा हो, जहां हर प्रकार सुविधा हो. जब तक हमारे पास पर्याप्त डॉक्टर नहीं हैं, तब तक पीएचसी स्तर पर न सोच कर जिला अस्पतालों को दुरुस्त करना होगा. आज 108 एंबुलेंस की सुविधा है. आसानी से ऐसे जिला अस्पतालों में इलाज करा सकते हैं.
डॉक्टरों में क्या बदलाव होने चाहिए?
जवाब : स्वास्थ्य विभाग में जो सबसे बड़ा बदलाव होना चाहिए, वो है मरीजों के साथ डॉक्टरों का अच्छा व्यवहार (डिग्निटी अॉफ ट्रीटमेंट) होना. हमारा जो मरीज है,उसे कुछ पता नहीं होता कि क्या बीमारी है? कैसे इलाज होगा? अक्सर हम उनके साथ बड़ा ही अमानवीय व्यवहार करते हैं. ये प्राइवेट में भी है और सरकारी में भी. मुझे लगता है कि एमबीबीएस कोर्स के अंदर भी केवल मेडिसिन ही नहीं, बल्कि मरीज के ह्यूमन बिहेवियर को जज करना, उनके साथ कम्यूनिकेशन स्कील कैसे बढ़ायें आदि की पढ़ाई भी हो. जब तक आपकी ट्रेनिंग का पार्ट ये नहीं होगा, तब तक संवेदनशील डॉक्टर नहीं मिलेंगे.
अपने कार्यकाल में सबसे अच्छा काम क्या किया और कौन सा काम पूरा न करने का मलाल रहेगा?
विभाग में आते ही मैंने देखा कि यहां नियमावली ही नहीं है, जिसके कारण नियुक्तियों में परेशानी हो रही है. पहले यहां नियमावली बनवायी. नियुक्ति होने से आपके पास निष्ठावान फोर्स रहेगा. संविदा पर लोग हैं, तो उनमें अनुशासनहीनता रहती है. दूसरा रिम्स में काॅर्निया का ट्रांसप्लांट शुरू कराया. ह्यूमन ट्रांसप्लांट एक्ट के तहत एडवाइजरी कमेटी बनायी. मेडिकल कॉलेज में सीट बढ़वाना एक बड़ा काम रहा. बच्चों के लिए आइसीयू जिलों में बनवाया, पांच डे केयर बच्चों के लिए बनवाया. मेटरनल मोर्टालिटी को हमने प्राथमिकता में रखा कि जनता कोई सूचना देती है, तो बाल विवाह को रोक सकें. 18 वर्ष के बाद शादी होने पर मेटरनल मोर्टालिटी रेट कम हो जायेगी. टाटा के कैंसर अस्पताल के लिए शिलान्यास न होने के मलाल रहेगा. रिनपास के लिए कुछ और करना था.
महिला सशक्तीकरण के लिए आप हमेशा प्रयास करती रही हैं, इस दिशा में यहां क्या काम होना चाहिए?
स्वास्थ्य विभाग में बड़ी संख्या में महिलाएं हैं. उनकी सुरक्षा की व्यवस्था हो, ताकि लेट नाइट में काम करने वाली महिलाएं मर्यादा के साथ काम कर सकें. महिला चिकित्सक, एएनएम व सहिया बड़ी संख्या में काम कर रही हैं. ये अपने आप में द्योतक है महिला सशक्तीकरण का.

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