रांची के रिम्स ऑडिटोरियम में जीवंत हुए चाणक्य कहा, "राष्ट्र से अधिक महत्व की कोई नीति नहीं होती"

रांची : पद्मश्री मनोज जोशी की प्रस्तुति "चाणक्य" का मंचन रिम्स ऑडिटोरियम में किया गया. "चाणक्य " मंचन का पहला दृश्य था, आचार्य चाणक्य के तक्षशिला छोड़कर पुरु नगर आ जाना .पहले ही दृश्य में चाणक्य के विचार और राष्ट्र को लेकर उनकी परिकल्पना जाहिर होती है. चाणक्य गांधार राजा आभी के यूनानी शासक अलिखसुंदर […]

रांची : पद्मश्री मनोज जोशी की प्रस्तुति "चाणक्य" का मंचन रिम्स ऑडिटोरियम में किया गया. "चाणक्य " मंचन का पहला दृश्य था, आचार्य चाणक्य के तक्षशिला छोड़कर पुरु नगर आ जाना .पहले ही दृश्य में चाणक्य के विचार और राष्ट्र को लेकर उनकी परिकल्पना जाहिर होती है. चाणक्य गांधार राजा आभी के यूनानी शासक अलिखसुंदर (अलेकजेंडर) से संधि करने के फैसले से नाराज थे. मंच पर निभाये जा रहे किरदार और उनके संवाद इतने प्रभावी थे कि इतिहास के उस काल खंड को सभी कलाकारों ने मिलकर उसे मंच पर जीवंत कर दिया.

नाटक के मंचन से पहले मनोज जोशी ने कटाक्ष करते हुए कहा, आज भी हम जात, धर्म में बंटे हैं. सोचिये 230 ईसा पूर्व आचार्य चाणक्य ने एक दासी पुत्र को चुना था. उन्होंने नाटक के मंचन की शुरूआत का जिक्र करते हुए कहा, हम पिछले 29 सालों में चाणक्य का मंचन देश के कई भागों में और विदेशों में कर चुके हैं. आज आप जो नाटक देखने वाले हैं, यह हमारा 1057 शो है.

सेवा फाउडेशन का आभार व्यक्त करते हुए मनोज जोशी ने कहा, हमें झारखंड में मौका मिला है इसके लिए हम इस संस्था का आभार व्यक्त करते हैं. इस संस्था के प्रदीप जी महाराज वंचितों के लिए काम कर रहे हैं . उन्होंने जब मुझसे यह बात कही, तो मैं जुड़ा और मुझे आपके बीच आने का मौका मिला.

सेवा कुंज और वंदेमातरम कुंज कुष्ट रोगियों के लिए काम कर रहे हैं. सबकुछ सरकार नहीं कर सकती. चाणक्य ने कहा था, व्यक्ति को समाज और समाज को राष्ट्र से जोड़ना है. जरूरी नहीं की आप इस तरह के कार्यों के लिए धन दें, जरूरी है कि आप मन दें. सेवा फाउंडेशन देवघर में शिक्षा और सेवा का काम कर रहा है. वनवासी अगर शिक्षा से जुड़ेंगे, तो वह और आगे आ सकेंगे. चाणक्य ने अखंड राज्य को अकत्रित करने का आह्वाहन किया था . मैं भी आपसे यही अपील करता हूं.
इस कार्यक्रम में राज्यपाल द्रोपदी मुर्मू, विधानसभा अध्यक्ष दिनेश उरांव, सांसद सुदर्शन भगत, विधायक अनंत ओझा, मेयर आशा लकड़ा के साथ आयोजक सेवा फाउंडेशन के सभी लोग शामिल रहे.
क्या रहा खास
चाणक्य नाटक के मंचन में कई संवाद ऐसे थे, जिसे दर्शकों ने खूब पसंद किया. कहानी 230 ईसा पूर्व की है. गांधार (वर्तमान में अफगानिस्तान) में तक्षशिला विद्या पीठ हुआ करती थी. आचार्य चाणक्य इसके कुलपति थे. गांधार राजा आभी ने यूनानी शासक अलिखसुंदर (अलेकजेंडर) से संधि कर ली. भारत पर आते संकट को देखते हुए चाणक्य गांधार छोड़कर अपने शिष्यों के साथ पुरु आ गये. इसके बाद उन्होंने खंड भारत को अखंड में बदलने के लिए यात्रा शुरू की.

जब वह मगध पहुंचे. मगध में सत्ता संघर्ष से परेशान चंद्रगुप्त जो दासी मूरा के पुत्र थे उन्हें साथ लिया. गंगा व यमुना के बीच निवास करने वाले शोषित आदिवासियों को एकजुट कर काशी, कौशल व मगध जैसे राज्यों पर विजय प्राप्त कर अखंड भारत की स्थापना की. इस छोटी सी कहानी को लगभग ढाई घंटे में बड़े ही रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया. मंच पर मौजूद एक – एक कलाकार से दर्शक अपना जुड़ाव महसूस कर रहे थे. संवाद और स्टेज पर हो रहे मंचन से दर्शक अपनी निगाहें नहीं हटा पा रहे थे.

चाणक्य के संवाद पर जोरदार तालियां
मंचन के दौरान कई ऐसे डॉयलॉग थे जिस पर दर्शकों ने त्वरित प्रतिक्रिया देते हुए तालियां बजायी. उनमें से कुछ हैं- सत्य द्रोही नहीं होता लेकिन जो राज्य सत्य से विपरीत होता है, वह राज्य द्रोही है. महान संत से मित्रता और महान योद्धा से शत्रुता ही पुण्यप्रद है. आचार्य चाणक्य जब युद्ध में छल की बात कहते हैं तो सेनापति उन्हें युद्ध में छल की बात पर रोकते हुए कहता है युद्ध में छल का इस्तेमाल गलत है आचार्य. इस पर चाणक्य महाभारत का उदाहरण देते हुए कहते हैं, "राष्ट्र से अधिक महत्व की कोई नीति नहीं होती". इस नाटक में एक के बाद एक कई ऐसे संवाद है जिस पर तालियां बजती है जिनमें "वचन कठोर या कोमल नहीं होते, कठोर होता है वचनों में छिपा हुआ सत्य".

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