रात आठ बजे के बाद क्या हुआ, किसी को कुछ नहीं पता

रांची : दीपक व रूपेश के पास से मिले सुसाइड नोट से पुलिस यह अंदाजा लगा रही है कि दोनों भाइयों ने परिवार के अन्य पांच लोगों की हत्या की और खुद भी फांसी के फंदे से झूल गये. दीपक के पास से 15 पेज का और रूपेश के पास से दो पेज का सुसाइड […]

रांची : दीपक व रूपेश के पास से मिले सुसाइड नोट से पुलिस यह अंदाजा लगा रही है कि दोनों भाइयों ने परिवार के अन्य पांच लोगों की हत्या की और खुद भी फांसी के फंदे से झूल गये. दीपक के पास से 15 पेज का और रूपेश के पास से दो पेज का सुसाइड नोट बरामद हुआ है. जबकि आमतौर पर सुसाइड नोट एक या दो पेज का सामने आता है.
मौके पर गये कई पुलिस अधिकारियों को भी 15 पेज का सुसाइड नोट समझ में नहीं आ रहा था. दूसरी ओर जिस बच्चे सूरज को सबसे पहले घटना की जानकारी मिली उसकी मां से भी मामले में बात की गयी. उन्होंने कहा कि अंतिम बार रविवार की रात आठ बजे झा परिवार को देखा था. सभी हंस बोल रहे थे. दीपक झा की पत्नी सोनी देवी उस वक्त रसोईघर में खाना बना रही थी.
इसके बाद वे भी अपने परिवार के साथ खाना खाकर सो गयीं. सोमवार की सुबह जब दीपक की बेटी दृष्टि को ले जाने के लिए स्कूल वैन घर पर पहुंचा और वह घर से नहीं निकली तो सूरज उसके यहां गया. तब मामला सामने आया. यानी करीब 12 घंटे बाद. इन 12 घंटों के अंदर क्या हुआ. यह किसी को नहीं पता. वहीं घटना के बारे में मकान मालकिन से बात की गयी, तो उन्होंने कहा कि उनके एक बेटे ने दीपाटोली में घर बनाया है.
उसके यहां पिछले 10 दिनों से महामृत्युंजय का जाप चल रहा था. इस वजह से उनका परिवार हर रोज सुबह में स्नान-ध्यान करने के बाद दीपाटोली चला जाता था और देर शाम पूजा समाप्ति के बाद लौटता था. रविवार को जब वे लोग लौटे, तो झा परिवार के घर का कमरा बंद था. इसके बाद वे लोग भी सो गये. सुबह में उन्हें दूसरे किरायेदारों ने मामले की सूचना दी.
मकान मालिक से 70 हजार का लिया था कर्ज
कहा जा रहा है कि दीपक झा ने अपने मकान मालिक से थोड़ा-थोड़ा करके कई बार में करीब 70 हजार रुपये कर्ज लिए थे. लेकिन वह पैसा भी वह नहीं चुका सका. बताया जाता है कि मुंगेर के रहने वाले सच्चिदानंद झा का परिवार पिछले सात माह से कांके थाना क्षेत्र के अरसंडे निवासी अलख नारायण मिश्रा के घर पर किराये पर रहता था.
लेकिन सिर्फ दो माह का किराया ही दिया था. इस संबंध में अलख नारायण की पत्नी ने बताया कि जब झा परिवार ने किराया पर कमरा लिया था तब पांच हजार रुपये प्रति माह किराया देने की बात हुई थी. एक बार शुरू में पांच हजार रुपये सच्चिदानंद झा ने दिया था. इसके बाद चार-पांच दिन पहले ही पांच हजार रुपये दिया था. यानी सात माह में 35 हजार रुपये की जगह सिर्फ दस हजार रुपये ही किराया दिया था.

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