बॉक्साइट निकालने के बाद मडुवापाठ को अपनों ने ही भुलाया, नरक जैसी स्थिति

बॉक्साइट निकालने के बाद मडुवापाठ को अपनों ने ही भुलाया, नरक जैसी स्थिति

किस्को़ कभी बॉक्साइट के लिए प्रसिद्ध पाखर पंचायत का मडुवापाठ क्षेत्र आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है. हिंडाल्को कंपनी ने यहां से बॉक्साइट खनन कर करोड़ों रुपये तो कमाये, लेकिन बदले में ग्रामीणों को मिले सिर्फ गहरे गड्ढे और झाड़ियां. विकास की रोशनी से कोसों दूर यह क्षेत्र अब पूरी तरह वीरानगी की ओर बढ़ रहा है. प्रभात खबर आपके द्वार कार्यक्रम में ग्रामीणों ने अपनी पीड़ा सुनायी, जिसमें लोगों ने कहा कि गांव में सुविधाओं के अभाव में किसी तरह जीवन काट रहे हैं. कोई सुनने वाला नही है. ग्रामीण सदहुल देवी, रंजीता देवी, बसंती देवी, रूबी कुमारी, बसंत नगेशिया और जीवन नगेशिया ने कहा कि न तो अधिकारी यहां सुध लेने आते हैं और न ही जनप्रतिनिधि. ग्रामीणों ने अपनी पीड़ा साझा करते हुए बताया कि सरकारी उपेक्षा और संसाधनों की कमी के कारण वे नारकीय जीवन जीने को विवश हैं. 50 घरों वाले गांव में बचे अब मात्र 10 परिवार : सुविधाओं के अभाव में लोग तेजी से गांव छोड़कर जा रहे हैं. ग्रामीणों ने बताया कि कभी इस गांव में 50 से अधिक घर हुआ करते थे, लेकिन अब मुश्किल से 10 घरों में लोग निवास कर रहे हैं. कई परिवार डहर बाटी और केराझरिया में जाकर बस गये हैं, जिससे मडुवापाठ में उनके पुश्तैनी मकान ध्वस्त हो रहे हैं. ग्रामीणों का कहना है कि यदि रोजगार और बुनियादी सुविधाएं बहाल नहीं हुईं, तो बचे हुए लोग भी जल्द पलायन कर जायेंगे. पानी के लिए जान जोखिम में, अंधेरे में भविष्य : गांव में पानी की समस्या सबसे विकराल है. महिलाओं को एक किलोमीटर दूर पथरीले रास्तों से होकर पहाड़ों के नीचे करीब 200 फीट नीचे उतरना पड़ता है. वहां स्थित चुआं से पानी भरकर लाना किसी चुनौती से कम नहीं है. जंगली जानवरों का खौफ भी बना रहता है. बिजली की स्थिति भी दयनीय है़ विभाग ने पोल तो गाड़ दिये हैं, लेकिन विद्युतीकरण नहीं होने से शाम ढलते ही गांव अंधेरे में डूब जाता है. इससे न तो बच्चों की पढ़ाई हो पा रही है और न ही खेती के लिए सिंचाई की व्यवस्था है. शिक्षा और स्वास्थ्य की बदतर हालत : शिक्षा की स्थिति ऐसी है कि गांव के बच्चे 10 किलोमीटर दूर तिसिया जाकर किसी तरह आठवीं तक पढ़ते हैं, इसके बाद की पढ़ाई उनके लिए सपना बन गयी है. संसाधनों के अभाव में युवा मवेशी चराने और मजदूरी करने को मजबूर हैं. गांव में स्वास्थ्य केंद्र नहीं होने से बीमार पड़ने पर प्रखंड या जिला मुख्यालय तक पहुंचना पहाड़ चढ़ने जैसा है. कई युवा बाहर कमाने चले जाते हैं, बाकी बचे हुए गाय-बकरी चराते हैं.

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By Shailesh ambashtha

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