पझरी पहाड़ पर माघ जतरा में लोक-संस्कृति और आस्था का उमड़ा महासंगम

पझरी पहाड़ पर माघ जतरा में लोक-संस्कृति और आस्था का उमड़ा महासंगम

By SHAILESH AMBASHTHA | January 7, 2026 10:09 PM

भंडरा़ लोहरदगा जिले के भंडरा प्रखंड अंतर्गत स्टेट हाइवे-143 एजी के किनारे स्थित ऐतिहासिक पझरी पहाड़ बुधवार को सैकड़ों वर्ष पुरानी आदिवासी सभ्यता और लोक-विश्वास का साक्षी बना. यहां आयोजित माघ जतरा महोत्सव में श्रद्धालुओं और दर्शकों की ऐतिहासिक सहभागिता दिखी. यह उत्सव झारखंड की अस्मिता, प्रकृति-पूजा और सामूहिक चेतना के प्रतीक के रूप में सांस्कृतिक गौरव के साथ संपन्न हुआ. परंपरा का पुनरुत्थान : 2016 से बना जन-आंदोलन : प्राचीन काल से चली आ रही यह महान परंपरा समय के साथ क्षीण हो गयी थी. वर्ष 2016 में बिंदेश्वर उरांव, भुनेश्वर उरांव, एतवा उरांव, बिरेंद्र उरांव और धन्नो उरांव जैसे जागरूक ग्रामीणों ने इसके पुनरुत्थान का संकल्प लिया. बिंदेश्वर उरांव ने बताया कि 2016 का वह छोटा सा प्रयास आज जिला स्तरीय सांस्कृतिक पहचान बन चुका है. पौराणिक मान्यता और पवित्र अनुष्ठान : महोत्सव के दौरान पहान पुजार के नेतृत्व में पहाड़ की चोटी पर विधिवत मुर्गी पूजा संपन्न की गयी. यह पूजा ग्राम-देवता को समर्पित होती है, जिसमें अच्छी फसल, सुख-शांति, स्वास्थ्य और प्राकृतिक आपदाओं से रक्षा की कामना की जाती है. लोक कथाओं के अनुसार, पझरी पहाड़ ग्राम-देवता की प्राचीन तपोभूमि है. यह महोत्सव चाला अयंग और महादेव-पार्वती की कथा से भी जुड़ा है. मान्यता है कि भगवान महादेव बाल रूप में चाला अयंग के यहां धांगर का काम करते थे और उन्हें इसी दिन काम से छुटी मिली थी. बूढ़ी मां के घर के गोहाल में गोबर सोना जैसा चमकने लगा था. जिसे गाने में पझरी पहाड़ को जोड़ा गया है. जो एक दिन पहले कुंबा जलाया जाता है वह उसी सोना का प्रतीक माना जाता है. इस अवसर पर पहाड़ की चोटी पर पहान पुजार के नेतृत्व में विधिवत पूजा संपन्न की गयी, जिसमें अच्छी फसल और सुख-शांति की कामना की गयी. जीवंत हुई लोक-संस्कृति : जतरा में दूर-दराज के गांवों से नृत्य मंडलियां गाजा-बाजा, कलसा और ढोल-नगाड़ों के साथ पहुँचीं. सामूहिक नृत्य और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज ने पूरे क्षेत्र को उत्सवमय बना दिया. इस गौरवशाली आयोजन में मुख्य रूप से अभिनव सिद्धार्थ भगत, बिंदेश्वर उरांव, भुनेश्वर उरांव, बिनय उरांव, एतवा उरांव, बीरेंद्र उरांव, महेश उरांव, परमेश्वर महली, इंद्रदेव उरांव, सुमित उरांव, बबलू उरांव, जगजीवन उरांव, महादेव पहान, पुणय उरांव, महादेव मुंडा, प्रमोद उरांव, सुरेंद्र उरांव, महेश उरांव सहित हजारों ग्रामीण उपस्थित थे.

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