बेतला नेशनल पार्क से संतोष कुमार की रिपोर्ट
आधुनिकता के इस दौर में जहां दुनिया डिजिटल हो चुकी है, वहीं समाज के सबसे पिछड़े पायदान पर खड़े मुसहर समुदाय के लिए आज भी आजीविका का जरिया आदिम तौर-तरीके ही हैं. कभी चूहों का शिकार करने के लिए जाने जाने वाले इस समुदाय के कई परिवारों के लिए आज भी जहरीले सांप ही पेट पालने का जरिया बने हुए हैं. इस समुदाय के लोग गांवों और कस्बों में डोर टू डोर (घर-घर) जाकर सांपों को दिखाते हैं और बदले में मिलने वाले अनाज या चंद रुपयों से अपना चूल्हा जलाते हैं.
जान हथेली पर रखकर घूमते हैं सपेरे
इस समुदाय के पुरुषों और बच्चों को सांपों के व्यवहार की गहरी समझ होती है. ये लोग बिना किसी आधुनिक उपकरण के बेहद जहरीले सांपों को भी आसानी से काबू कर लेते हैं. दिन की शुरुआत होते ही ये अपनी टोकरियों में सांपों को लेकर निकल पड़ते हैं. घर-घर जाकर सांप का खेल दिखाना और लोगों के मन से सांप का डर दूर करना इनका मुख्य काम है. बदले में लोग इन्हें मुट्ठी भर अनाज, पुराने कपड़े या दस-बीस रुपये दे देते हैं. इसी मामूली कमाई से पूरे परिवार का भरण-पोषण होता है.
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कानून और पेट की भूख के बीच टकराव
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत सांपों को पकड़ना और उनका व्यावसायिक प्रदर्शन करना पूरी तरह से गैरकानूनी है. ऐसे में इन लोगों को हमेशा पुलिस और वन विभाग का डर सताता रहता है. कई बार इनकी टोकरियाँ और सांप जब्त कर लिए जाते हैं. इस समुदाय के एक बुजुर्ग का कहना है कि कानून अपनी जगह सही है, लेकिन अगर हम यह काम छोड़ दें तो हमारे बच्चे भूखे मर जाएंगे. हमारे पास न तो खेती के लिए जमीन है और न ही कोई दूसरा हुनर.
बदलते वक्त के साथ घट रही कमाई मोबाइल और इंटरनेट के युग में अब लोग गलियों में आने वाले सपेरों को देखना पसंद नहीं करते. खास तौर पर नई पीढ़ी के बच्चे अब इस खेल में रुचि नहीं दिखाते. इसके कारण इस पारंपरिक काम से होने वाली आय लगातार घट रही है. पूरा दिन धूप और धूल में भटकने के बाद भी कई बार इतनी कमाई नहीं हो पाती कि दो वक्त की रोटी का इंतजाम हो सके. इसके अलावा, बिना किसी सुरक्षा के जहरीले सांपों को पकड़ने में हमेशा जान का जोखिम बना रहता है.
मुख्यधारा से जोड़ने का लक्ष्य
मुख्यधारा से जोड़ने की दरकार सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि मुसहर समुदाय को इस खतरनाक और गैरकानूनी काम से बाहर निकालने के लिए केवल कानून का डर दिखाना काफी नहीं है. सरकार को इनके पुनर्वास के लिए ठोस कदम उठाने होंगे. जब तक इस समुदाय के बच्चों को सही शिक्षा और युवाओं को सम्मानजनक रोजगार नहीं मिलेगा, तब तक ये अपनी जान जोखिम में डालकर 'डोर टू डोर' भटकने को मजबूर रहेंगे.
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