कुणाल ने बताया कि उनका प्रोजेक्ट काया-न्यूरोसिंक एक ओपन-सोर्स हार्डवेयर व सॉफ्टवेयर आधारित एडवांस्ड ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस समाधान है. यह तकनीक उन लोगों के लिए आशा की नयी किरण है, जो पूर्ण रूप से लकवाग्रस्त हैं या गंभीर डिसएबिलिटी से जूझ रहे हैं. उन्होंने बताया कि यह डिवाइस शरीर के बायो-पोटेंशियल सिग्नल्स जैसे मस्तिष्क की तरंगें और आंखों की गतिविधि को पढ़कर बिना बोले और बिना किसी शारीरिक स्पर्श के व्हीलचेयर, रोबोटिक आर्म या अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को नियंत्रित करने में सक्षम बनाती है. उन्होंने बताया कि जहां विदेशी मेडिकल उपकरणों की कीमत करोड़ों रुपये तक पहुंच जाती है. वहीं उनका यह नवाचार कम लागत में अत्याधुनिक समाधान देगा. उन्होंने बताया कि इस प्रोजेक्ट की नींव नीति आयोग की कम्युनिटी इनोवेटर फेलोशिप के दौरान आईएसएम धनबाद के मार्गदर्शन में रखी गयी थी.
राष्ट्रीय से अंतर्राष्ट्रीय मंच तक प्रतिभा का लोहा कुणाल की प्रतिभा केवल राष्ट्रीय स्तर तक सीमित नहीं है. इससे पहले वे स्मार्ट इंडिया हैकाथॉन में भी प्रथम पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं. इंजीनियरिंग और कंप्यूटर साइंस के अद्भुत संयोजन के बल पर उन्होंने प्रतिष्ठित मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (अमेरिका) से इनोवेशन लीडरशिप प्रोग्राम लगभग 90 प्रतिशत वित्तीय सहायता के साथ सफलतापूर्वक पूरा किया. उन्होंने बताया कि न्यूरो-टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट कार्य को तब वैश्विक मान्यता मिली, जब उन्हें पुर्तगाल के लिस्बन स्थित विश्व-प्रसिद्ध चम्पालिमॉड सेंटर फॉर द अननोन में कजाल एडवांस्ड न्यूरोसाइंस ट्रेनिंग प्रोग्राम के लिए चयनित किया गया. इस प्रतिष्ठित कार्यक्रम के लिए उन्हें 100 प्रतिशत वित्तीय सहायता प्रदान की गयी, जो उनकी शोध क्षमता और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता को दर्शाता है.राष्ट्रीय मंच पर चमके कोडरमा के युवा वैज्ञानिक कुणाल
गौशाला रोड निवासी मैकेनिकल इंजीनियर और युवा इनोवेटर कुणाल अम्बष्ट (पुत्र कौशलेश कुमार अम्बष्ट व संगीता अम्बष्ट) ने एक बार फिर जिले और राज्य का नाम राष्ट्रीय स्तर पर रोशन किया है.
