जयनगर. रवि फसलों में गेहूं महत्वपूर्ण फसल है. इसकी बुआई धनकटनी के बाद होती है. इसके लिए ठंड का मौसम उपयुक्त होता है. धनकटनी ने त्योहार के बाद रफ्तार पकड़ ली है. वहीं खेत खाली होते ही गेहूं की बुआई शुरू हो गयी है. यह सभी प्रकार के खेतों में लगायी जानीवाली फसल है. खासकर पीली और भुरभुरी मिट्टी में लगायी जाती है. इसका खेत तैयार करने समय यह ध्यान रखना होगा कि खेत का मिट्टी डेला नहीं बने और पूर्व फसल का कोई अवशेष खेत में ना रहें. इस संबंध में जानकारी देते हुए कृषि विज्ञान केंद्र जयनगर कोडरमा के एग्रो फोरेस्टी ऑफिसर रूपेश रंजन ने बताया कि गेहूं की खेती के लिए मिट्टी को भुरभुरा बनाना चाहिये. बुआई के समय खेत में पर्याप्त नमी हो. देर से बुआई होने पर पैदावर कम हो जाती है. बताया कि बुआई से पहले बीज के अंकुरण की क्षमता की जांच जरूरी है. यदि बीज उपचारित नहीं है, तो बिटा वैक्स या वैरी स्टीन नामक दवा दो ग्राम प्रतिकिलो ग्राम बीज दर से मिला दे. श्री कुमार ने बताया कि पहली सिंचाई 20-25 दिन बाद, दूसरी 40-50 दिन बाद, तीसरी 60-65 दिन बाद और चौथी सिंचाई 80-85 दिन बाद करनी चाहिये. बताया कि बोयी गयी गेहूं में नेत्रजन व स्फूर डाले. उन्नत किस्मों में गंगा, राजेश्वरी, करण वंदना, सोनाली आदि शामिल है. बुआई की विधि: उन्होंने बताया कि सिंचित अवस्था में गेहूं की फसल में कतार से कतार की दूरी 20-22 सेंटीमीटर और लगायी गयी फसल में कतार की दूरी 15-18 सेंटीमीटर रखे, 5-6 इंच गहरायी में बीज बोये. बुआई के समय 50 किलोग्राम प्रति एकड़ बीज का उपयोग करें. दिसंबर माह के प्रथम व द्वितीय पखवाडे में बीज दर क्रमश 54-60 किलोग्राम प्रति एकड़ कर दें.
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