ओके...प्रजा का हित ही सर्वोपरि था जिनके राज्य में

अोके…प्रजा का हित ही सर्वोपरि था जिनके राज्य में 12कोडपी2. महाराजा अग्रसेन महाराजा अग्रसेन की जयंती पर विशेष लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व प्रताप नगर के राजा बल्लभ के घर पुत्र का जन्म हुआ. राजमहल में उत्सव मनाया गया. छठी के दिन पुत्र की जन्मपतरी देख कर ज्योतिषी ने भविष्यवाणी की कि बालक वैश्य वंश […]

अोके…प्रजा का हित ही सर्वोपरि था जिनके राज्य में 12कोडपी2. महाराजा अग्रसेन महाराजा अग्रसेन की जयंती पर विशेष लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व प्रताप नगर के राजा बल्लभ के घर पुत्र का जन्म हुआ. राजमहल में उत्सव मनाया गया. छठी के दिन पुत्र की जन्मपतरी देख कर ज्योतिषी ने भविष्यवाणी की कि बालक वैश्य वंश में श्रेष्ठ व वैश्यों का उद्धारक होगा. अग्रसेन शुरू से ही विद्या, बुद्धि में कुशल तथा शस्त्र चलाने में बेजोड़ थे. राजा विशाल की पुत्री माधवी से अग्रसेन का विवाह हुआ. राजा वल्लभ ने अग्र को राज सिंहासन पर सुशोभित किया और स्वयं वनप्रस्थ आश्रम के लिए वन में चले गये. राजा अग्र ने अपने राज्य को लोकतंत्र के आधार पर चलाया, जिससे उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गयी. देवराज इंद्र को उनकी इस ख्याति से जलन हो गयी और राजा अग्र के राज्य में उन्होंने वर्षा बंद करवा दी. राज्य में चारों तरफ अकाल पड़ गया. राजा से प्रजा का यह दुख देखा नहीं गया और वे हरिद्वार के पास गंगा किनारे भगवान शिव की उपासना में लग गये. भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उनको आदेश दिया कि- तुम महालक्ष्मी की आराधना करो. राजा अग्र ने महालक्ष्मी की तपस्या की. राजा की तपस्या व साहस से प्रसन्न होकर देवी महालक्ष्मी प्रकट हुई और आज्ञा दिया कि- तुम कोल्हापुर जाकर नाग राजाओं से अपने संबंध स्थापित करो. उससे तुम्हारे राज और कुल दोनों की वृद्धि होगी. देवी महालक्ष्मी का आदेश पाकर राजा अग्र ने कोल्हापुर प्रस्थान किया. कोल्हापुर के राजा महिस्थी की कन्या सुंदरावती अत्यंत रूपवती व गुणवती थी. सुंदरावती के स्वयंवर में दूर-दूर के अनेक राजा आये थे. महाराजा अग्रसेन भी वहां उपस्थित थे. देवी महालक्ष्मी की प्रेरणा से सुंदरावती ने स्वयंवर में महाराजा अग्रसेन का वरण किया. नाग राजा की पुत्री से अग्रसेन की विवाह की बात सुन कर इंद्र ने नारद जी को बुलाया और कहा कि – महाराजा अग्र के राज्य में वृष्टि न करके मुझसे भूल हुई है. कृपया आप अग्र से मेरी संधि करा दें. नारद जी राजा अग्र की सभा में गये और इंद्र की संधि प्रस्ताव रखा. राजा अग्र ने नारद जी का सत्कार किया और उनकी आज्ञा से इंद्र से संधि कर ली. अग्रसेन जी की नम्रता व शिष्टता से प्रभावित होकर इंद्र ने स्वयं उनके दरबार में पहुंच कर उन्हें गले से लगा लिया. इंद्र ने राजा अग्रसेन को कहा कि – तुम यमुना तट पर महालक्ष्मी की कठोर आराधना करो. वही तुम्हारे राज्य संवर्द्धन का वरदान देंगी. राज्य की समृद्धि व प्रजा के हित के लिए राजा अग्र ने नौका द्वारा यमुना तट पर जाकर घने जंगल में कठिन तपस्या आरंभ कर दी. देवी महालक्ष्मी राजा अग्र की तपस्या से प्रसन्न होकर प्रकट हुई और कहा- राजन तुम इस कठिन तप को बंद करो. तुम अपने राज्य में वापस जाओ. मैं तुम्हें समस्त वैभव व सिद्धि प्रदान करूंगी. आज से यह पृथ्वी तेरे वंश से प्रेरित होगी. आज से यह कुल तेरे नाम से जाना जायेगा. जब तक अग्रवंशियों में महालक्ष्मी की आराधाना चलती रहेगी, वे हमेशा उन्नति के शिखर पर रहेंगे. देवी महालक्ष्मी का वरदान पाकर राजा अग्र ने अपने राज्य में आकर राज्य की समृद्धि के लिए अपना तन, मन, धन सर्वस्व लगा दिया. हरिद्वार के पश्चिम की ओर जहां उन्होंने तपस्या की थी, उसके निकट अशोक नगरी की स्थापना की. नगर के बीच देवी महालक्ष्मी का भव्य मंदिर बनवाया. राजा अग्र ने अपने राज्य का विस्तार 18 गणराज्यों में किया, जहां लोकतांत्रिक राज व्यवस्था से शासन चलाया. प्रजा ही राज्य में सर्वोपरि होती थी. सर्वत्र सुख- शांति था. राज्य की प्रतिष्ठा के लिए महाराजा अग्रसेन ने 18 यज्ञ किये, पर यज्ञ के अंत में होने वाली पशु बलि से उन्हें आत्म ज्ञान प्राप्त हुआ. तीव्र वेदना के कारण उन्होंने राज्य में पशु बलि बंद करवा दी. शुद्ध शाकाहारी भोजन को प्रजा ने भी अपनी जीवन पद्धति बना ली. उनके राज में धनी व निर्धन में कोई भेदभाव नहीं था. अग्र के राज में गो रक्षा, खेती व व्यापार पर विशेष ध्यान दिया गया.108 वर्ष राज्य करने के बाद महाराजा अग्रसेन देवी महालक्ष्मी की आज्ञा से अपने बेटे विभू को राज्य सौंप कर स्वयं तपस्या करने चले गये. महाराजा अग्रसेन के वंशजों ने 11वीं शताब्दी तक अग्रोक, कालांतर में जिसे अग्रोहा कहा जाने लगा, नगर पर राज किया. मुहम्मद गोरी ने जब भारत पर आक्रमण किया, तो अग्रोहा भी उसके क्रूर आक्रमण से बच नहीं पाया. अग्रोहा को लूट कर गौरी ने उसे पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया. त्रस्त होकर महाराजा अग्रसेन के वंशज आसपास के राज्यों में दूर-दूर तक बिखर गये. अग्रोहा में रह गये मात्र खंडहर, जो आज भी महाराजा अग्रसेन जी की गौरव गाथा कह रहे हैं. महाराजा अग्रसेन के प्रतिभाशाली वंशज को वर्तमान में अग्रवाल नाम से जाना जाता है. अग्रवाल जाति ने अपनी कुल भूमि के पुनर्निर्माण का संकल्प उठाया है और वर्तमान में हिसार हरियाणा के पास खंडहरों में उभर रहा है. महाराजा अग्रसेन की जयंती पर समाज की ओर से भी कई कार्यक्रम आयोजित किये जा रहे हैं.

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