जमशेदपुर : करनडीह स्थित दिसोम जाहेरथान में धाड़ दिशोम माझी परगना माहाल पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था की बैठक देश परगना बाबा बैजू मुर्मू के अध्यक्षता में हुई. इसमें पिछले दिनों एनआइटी जमशेदपुर के कार्यक्रम में राष्ट्रीय जनजाति आयोग की सदस्य डॉ आशा लकड़ा के उस बयान पर कड़ा प्रतिक्रिया व्यक्त किया गया. इसमें उसने कहा था कि सरना कोई धर्म नहीं पूजा स्थल है.
हास्यास्पद बयानबाजी करना समझ से परे : बैजू
देश परगना बैजू मुर्मू ने कहा - राष्ट्रीय जनाजति आयोग जैसे महत्वपूर्ण पद में बैठकर इस तरह हास्यास्पद बयानबाजी करना समझ से परे है. ऐसा लगता है डॉ आशा लकड़ा को जानकारी का अभाव है या फिर किसी के इशारे पर सरना समाज विरोधी कार्य कर रही हैं. मौके पर हरिपोदो मुर्मू, दसमत हांसदा, पुन्ता मुर्मू, लखन मार्डी देश पारानिक बाबा दुर्गाचरण मुर्मू, नवीन मुर्मू, गोपाल हांसदा, सुखराम किस्कू, रेंटा मुर्मू, लेदेम मुर्मू, कारु मुर्मू, शंकर हेंब्रम, विश्वनाथ मार्डी, सलखू सोरेन, जितु मुर्मू, बिपिन चंद्र मुर्मू, सुशील मुर्मू, वीर सिंह बास्के, सुनील मुर्मू समेत काफी संख्या में समाज के लोग मौजूद थे.
2027 की जनगणना से पूर्व सरना धर्म कोड लागू करे केंद्र सरकार : बैजू
बैजू मुर्मू ने कहा - देश भर में सरना धर्म को मानने वाले आदिवासियों की संख्या करोड़ों में है. भारत के विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी समुदाय ने अपनी-अपनी धार्मिक व सांस्कृतिक व्यवस्था को अक्षुण्ण रखा है, जिनमें सरना धर्म मानने वालों की आबादी सर्वाधिक है. उन्होंने जोर देकर कहा कि आदिवासी ना कभी हिंदू थे, ना हैं और ना कभी होंगे. साल 2011 की जनगणना में 50 लाख से अधिक आदिवासियों ने कॉलम कोड में सरना धर्म दर्ज कराया था, वहीं आगामी जनगणना में यह संख्या करोड़ों में होगी. उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की कि वर्ष 2027 की जनगणना से पूर्व सरना धर्म कोड को आधिकारिक मान्यता दी जाए. साथ ही, आदिवासियों को ''वनवासी'', ''जंगली'' या ''सनातनी'' कहकर दिग्भ्रमित करने वाले नेताओं को बयानबाजी से बाज आने की सलाह दी गई. चेतावनी दी गई कि यदि सरना धर्म के खिलाफ बयानबाजी बंद नहीं हुई, तो सामाजिक व्यवस्था के तहत कठोर कार्रवाई की जाएगी.
